थाची रेंज के जंगलों में ग्लायफोसेट का कथित कहर: मटर की फसल के लिए वनस्पति उजाड़ने के आरोप, वन विभाग की जवाबदेही पर सवाल

ऊंचाई वाले जंगलों में खरपतवारनाशी के छिड़काव से घास और वनस्पति नष्ट करने का आरोप, फोटो और शिकायतों के आधार पर जांच की मांग

अमर ज्वाला//मंडी,थाची

हिमाचल प्रदेश के जिला मंडी के नाचन वन मंडल के अंतर्गत थाची रेंज के ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में मटर की फसल उगाने के लिए जंगलों और आसपास की भूमि पर खरपतवारनाशी रसायन ग्लायफोसेट के कथित अंधाधुंध प्रयोग का गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि कई स्थानों पर घास और अन्य प्राकृतिक वनस्पति को रसायन का स्प्रे कर नष्ट किया जा रहा है और इसके बाद जमीन को मटर की खेती के लिए तैयार किया जा रहा है।

स्थानीय लोगों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि यह गतिविधियां कोई एक-दो दिन की नहीं हैं, बल्कि क्षेत्र के कुछ ऊंचाई वाले इलाकों में पिछले कई वर्षों से इस प्रकार की शिकायतें सामने आती रही हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि जंगलों और वन भूमि में बड़े पैमाने पर रासायनिक खरपतवारनाशी का इस्तेमाल हो रहा है तो इसकी जानकारी संबंधित वन अधिकारियों और कर्मचारियों को क्यों नहीं हुई? और यदि जानकारी थी तो इसे रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

बताया जा रहा है कि वन विभाग ने कुछ स्थानों पर कथित रूप से वन भूमि पर उगाई गई मटर की फसल को नष्ट करने की कार्रवाई की है, लेकिन आलोचना इस बात को लेकर है कि **फसल दिखाई देने के बाद कार्रवाई करने के बजाय उस रासायनिक छिड़काव को समय रहते क्यों नहीं रोका गया, जिससे प्राकृतिक घास, झाड़ियां और अन्य वनस्पति को नुकसान पहुंचने का आरोप है।

वन रक्षकों से लेकर अधिकारियों तक की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग

क्षेत्र में यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि इस प्रकार की गतिविधियों पर लंबे समय तक प्रभावी रोक न लग पाने के कारण संबंधित वन रक्षक, बीट स्टाफ और उच्च अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी है।

जागरूक नागरिकों ने मांग की है कि सरकार और वन विभाग केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक जांच सीमित न रखें, बल्कि संबंधित अवधि के दौरान तैनात रहे **वन रक्षकों, वन खंड अधिकारियों, रेंज अधिकारियों तथा अन्य जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए।** यह जांच की जाए कि किन क्षेत्रों में रासायनिक स्प्रे हुआ, कितने क्षेत्र की प्राकृतिक वनस्पति प्रभावित हुई और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई बनती है।

जैव विविधता, पशुधन और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंता

ग्लायफोसेट के स्वास्थ्य और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर दुनिया भर में वैज्ञानिक और नियामक स्तर पर लंबे समय से बहस चल रही है। इसलिए जंगल या संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र में इसके उपयोग के आरोपों की वैज्ञानिक जांच बेहद जरूरी है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्राकृतिक घास और वनस्पति को बड़े क्षेत्र में लगातार रसायनों के प्रयोग से नष्ट किया जा रहा है तो इसका असर **मिट्टी की गुणवत्ता, सूक्ष्म जीवों, वनस्पति विविधता, पशुओं के चारे और स्थानीय वन्यजीवों के आवास** पर पड़ सकता है। हिमालयी क्षेत्रों में ढलानदार भूमि पहले ही भूस्खलन और कटाव के प्रति संवेदनशील है। ऐसे में प्राकृतिक वनस्पति को व्यापक स्तर पर नष्ट करने के आरोपों की गंभीरता से जांच होना आवश्यक है।

कुछ लोगों ने क्षेत्र में पिछले वर्षों के दौरान भारी बारिश और भूस्खलन से हुई तबाही को भी जंगलों और पर्वतीय ढलानों की कमजोर होती स्थिति से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं। हालांकि, किसी विशेष भूस्खलन या आपदा का कारण केवल ग्लायफोसेट अथवा किसी एक गतिविधि को मान लेना वैज्ञानिक जांच के बिना उचित नहीं होगा। विशेषज्ञों द्वारा मिट्टी, वनस्पति और प्रभावित क्षेत्रों का अध्ययन कर वास्तविक कारणों की पड़ताल जरूरी है।

सबसे बड़ा सवाल—फसल पर कार्रवाई, लेकिन रसायन के प्रयोग पर रोक क्यों नहीं?

स्थानीय नागरिकों का सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि वन भूमि पर अवैध खेती के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है तो उस प्रक्रिया की शुरुआत में इस्तेमाल किए जा रहे कथित रासायनिक खरपतवारनाशी की निगरानी और रोकथाम क्यों नहीं हुई?

लोगों का कहना है कि केवल तैयार फसल को नष्ट कर देना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी क्षेत्र में मटर या अन्य फसल उगाने के लिए पहले जंगल की प्राकृतिक घास और वनस्पति को रसायन के माध्यम से नष्ट किया गया है, तो जांच का दायरा वहां से शुरू होना चाहिए।

सरकार से उच्च स्तरीय जांच की मांग

क्षेत्र के लोगों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े नागरिकों ने सरकार से मांग की है कि थाची रेंज और नाचन वन मंडल के संबंधित क्षेत्रों का **स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक सर्वेक्षण** कराया जाए। ड्रोन सर्वे, सैटेलाइट चित्रों, वन विभाग के रिकॉर्ड और मौके से मिट्टी व वनस्पति के नमूनों के आधार पर यह पता लगाया जाए कि किन-किन क्षेत्रों में प्राकृतिक वनस्पति को नष्ट कर खेती की गई है।

मांग की गई है कि जांच में निम्न बिंदुओं को शामिल किया जाए—

* किन क्षेत्रों में जंगल या वन भूमि पर खेती के लिए प्राकृतिक वनस्पति हटाई गई?

* क्या वहां ग्लायफोसेट या किसी अन्य खरपतवारनाशी रसायन का प्रयोग हुआ?

* संबंधित क्षेत्र में कितने समय से ऐसी गतिविधियां चल रही हैं?

* क्या वन विभाग के स्थानीय कर्मचारियों और अधिकारियों को इसकी जानकारी थी?

* शिकायतें मिलने के बावजूद समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

* प्रभावित क्षेत्रों की मिट्टी, जलस्रोतों और जैव विविधता पर क्या प्रभाव पड़ा?

* दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी?

अब जांच और जवाबदेही से ही खुलेगा पूरा सच

थाची और सिराज क्षेत्र के जंगल केवल लकड़ी या जमीन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि हजारों लोगों की जल, पर्यावरण और आजीविका सुरक्षा से जुड़े हुए हैं। इसलिए जंगलों की प्राकृतिक वनस्पति को नष्ट कर खेती किए जाने और कथित रूप से रासायनिक खरपतवारनाशी के प्रयोग जैसे गंभीर आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

सरकार और वन विभाग को चाहिए कि मामले की निष्पक्ष जांच करवाई जाए और जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं। यदि किसी व्यक्ति, कर्मचारी या अधिकारी की भूमिका अथवा लापरवाही सामने आती है तो कानून और विभागीय नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाए।

जंगलों को उजाड़ने वालों पर कार्रवाई केवल खेत में खड़ी फसल तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सवाल यह भी तय होना चाहिए कि जंगल की हरियाली नष्ट होने तक जिम्मेदार विभाग और अधिकारी आखिर कहां थे।

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