अमर ज्वाला//कुल्लू-मनाली
देवभूमि हिमाचल की विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी कुल्लू-मनाली को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे की दीवारें इन दिनों पोस्टर और बैनरों से लटकी पड़ी हैं। हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद सार्वजनिक संपत्तियों और हाईवे की दीवारों को प्रचार का अड्डा बनाए जाने से ऐसा प्रतीत होता है कि जिम्मेदार अधिकारियों के लिए अदालत के आदेश भी महज कागज का टुकड़ा बनकर रह गए हैं।

हालात देखकर यही कहने को मजबूर होना पड़ता है “अंधेर नगरी, चौपट राजा!” जिस हाईवे से प्रतिदिन हजारों पर्यटक और स्थानीय लोग गुजरते हैं, उसी की दीवारों को पोस्टर-बैनर चस्पाने वालों ने अपनी निजी प्रचार पट्टी समझ लिया है। सवाल यह है कि जब हाईकोर्ट ने सार्वजनिक संपत्तियों का सौंदर्य बिगाड़ना और अवैध पोस्टर-बैनरों पर रोक के निर्देश दे रखे हैं, तो आखिर सरकारी तंत्र की आंखों के सामने यह सब कैसे चल रहा है?
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 27 अगस्त 2007 को CWP No. 1374 of 2006, राजेश कुमार शर्मा बनाम राज्य हिमाचल प्रदेश एवं अन्य मामले में प्रदेश में होर्डिंग और विज्ञापनों को नियंत्रित करने के संबंध में महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए थे। राष्ट्रीय राजमार्गों पर नियमों का पालन सुनिश्चित करने तथा नियमों के विपरीत लगे होर्डिंग हटाने की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों को दी गई थी।

इसके बावजूद कुल्लू-मनाली नेशनल हाईवे की दीवारों पर खुलेआम पोस्टर और बैनर चस्पा होना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
हाईकोर्ट ने 16 अक्टूबर 2017 को सरकारी संपत्तियों पर दीवार लेखन, पोस्टर, कटआउट, होर्डिंग और बैनर लगाने के खिलाफ सख्त रुख अपनाया था। अदालत ने सार्वजनिक और सरकारी संपत्तियों के सौंदर्य को बिगाड़ना गंभीर विषय माना था।
इसके बाद CWPIL No. 47 of 2022, Court on its own motion बनाम State of H.P. एवं अन्य मामले में हाईकोर्ट ने अवैध होर्डिंग, पोस्टर और बैनरों के मामले को गंभीरता से लिया।
27 अक्टूबर 2022 को हाईकोर्ट ने इस मामले में आदेशों का दायरा पूरे हिमाचल प्रदेश तक बढ़ा दिया। इसका मतलब साफ है कि मामला केवल शिमला या किसी एक शहर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रदेशभर में सार्वजनिक स्थानों और संपत्तियों के सौंदर्य बिगाड़ने को रोकने की जिम्मेदारी संबंधित प्रशासन की है।
अब सवाल कुल्लू प्रशासन, संबंधित नगर निकाय, लोक निर्माण विभाग, राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े अधिकारियों और अन्य जिम्मेदार सरकारी एजेंसियों से है कि क्या कुल्लू-मनाली नेशनल हाईवे की दीवारों पर पोस्टर-बैनर लगाने की अनुमति दी गई है?
अगर अनुमति नहीं दी गई तो इन्हें लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद सार्वजनिक संपत्तियों का विद्रूपीकरण रोकने में अधिकारी नाकाम क्यों हैं?
अब देखना यह है कि “अंधेर नगरी, चौपट राजा” वाली इस व्यवस्था में जिम्मेदार अधिकारी जागते हैं या फिर पोस्टर-बैनर इसी तरह सरकारी तंत्र की आंखों के सामने दीवारों पर चिपकते रहेंगे।अगर चाहें तो मैं इसे अमर ज्वाला के लिए और ज्यादा धारदार, फ्रंट-पेज वाली खोजी खबर के रूप में भी तैयार कर सकता हूं, जिसमें “किस अधिकारी की जिम्मेदारी है, किस विभाग को पोस्टर हटाने हैं और हाईकोर्ट के आदेश में क्या-क्या कहा गया” अलग बॉक्स में दिया जाए।
