मंडी में पांचवीं पीढ़ी के नाम पर सरीन का नया शोरूम, पीढ़ियों पुरानी सराफा कारोबार की विरासत को आगे बढ़ा रहा परिवार

मोती बाजार में सिल्वर प्लेटेड आभूषणों के नए शोरूम का शुभारंभ, दादा से पोती तक पहुंचा कारोबार का सफर

अमर ज्वाला//मंडी

मंडी शहर के प्रतिष्ठित सराफा कारोबारी परिवार रतन सिंह एंड संस ने अपनी पांचवीं पीढ़ी की नन्ही सदस्य सरीन के नाम पर मोती बाजार में सिल्वर प्लेटेड आभूषणों के नए शोरूम का शुभारंभ किया है। यह शोरूम केवल एक नए कारोबार की शुरुआत नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक कारोबारी विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रतीक भी है।

सरीन शोरूम के आभूषण 

इस अवसर पर अमर ज्वाला से बातचीत करते हुए तीसरी पीढ़ी के सराफा कारोबारी रतन सिंह सरदार ने अपने परिवार के कारोबारी सफर की दिलचस्प जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि उनके दादा सरदार गोपाल सिंह लगभग 1930-32 के आसपास कारोबार के सिलसिले में हिमाचल आए थे। सबसे पहले परिवार सुंदरनगर पहुंचा और उसके बाद मंडी में कारोबार शुरू किया।

उन्होंने बताया कि उनके परिवार की जड़ें पंजाब के अमृतसर के निकट भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित अटारी गांव से जुड़ी हैं। वहां आज भी परिवार की जमीन और कारोबार से जुड़ी पुरानी विरासत मौजूद है। सोने के आभूषण बनाने और बेचने का काम उनके परिवार में पीढ़ियों से चला आ रहा है। उनके पिता सरदार जसवंत सिंह ने भी इस पारिवारिक व्यवसाय को आगे बढ़ाया।

रतन सिंह सरदार ने बताया कि अब उनके बेटे राजा सिंह सहित परिवार की चौथी पीढ़ी कारोबार को आगे बढ़ा रही है, जबकि पांचवीं पीढ़ी में शामिल नन्ही बेटी सरीन के नाम पर नया शोरूम शुरू किया गया है। परिवार का प्रयास है कि आने वाली पीढ़ियां भी इस पारंपरिक व्यवसाय को आधुनिक स्वरूप देते हुए आगे बढ़ाएं और कारोबार का विस्तार करें।

बातचीत के दौरान अमर ज्वाला ने रतन सिंह सरदार से यह भी पूछा कि मंडी जिले के पधर, सुंदरनगर, मंडी और नेरचौक सहित विभिन्न स्थानों पर रतन ज्वेलर्स के नाम से कई शोरूम संचालित होते दिखाई देते हैं। क्या ये सभी शोरूम उनके परिवार से संबंधित हैं?

इस पर रतन सिंह सरदार ने बताया कि रतन उनका अपना नाम है और इसी नाम से कारोबार को पहचान मिली है। उन्होंने कहा कि उनके नाम पर ही कारोबार से जुड़े शोरूमों में रतन ज्वेलर्स नाम रखा गया है, ताकि इस नाम की पहचान और कारोबारी परंपरा आगे भी बनी रहे।

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उन्होंने कहा कि परिवार का यह कारोबार केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दादा से शुरू हुआ सफर अब पांचवीं पीढ़ी तक पहुंच चुका है।

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