चौहार घाटी के आराध्य देवता श्री हुरंग नारायण भगवान विष्णु तो है ही जिन्हें भगवान कृष्ण के नाम से भी जाना जाता है , और उनके बड़े भाई श्री घड़ौनी नारायण जिन्हें बलराम के नाम से भी जाना जाता है।
वही मंडी जनपद के राज माधोराय भी वही भगवान विष्णु जी स्थापित राजा सूरज सेन द्वारा 1637 में स्थापित किया हुआ है उससे पहले देव श्री हुरंग नारायण जी को पूजा जाता रहा। स्थान अलग अलग लेकिन समस्त देवी देवताओं को अलग अलग क्षेत्रों में अपनी अपनी संस्कृति से अपनी अपनी आस्था अनुसार देव संस्कृति से जुड़े हुए हैं। समस्त देवी देवताओं को शत शत प्रणाम।
सुभाष ठाकुर*****
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विरासत पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण शोध पत्र में चौहार घाटी के आराध्य देव श्री हुरंग नारायण से लेकर मंडी रियासत के राज्यदेव माधो राय तक की आस्था और सत्ता के ऐतिहासिक क्रम का प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। यह शोध पत्र डॉक्टर संदीप राघव द्वारा लिखा गया है, जो International Journal of Research in Social Sciences (ISSN: 2249-2496) में प्रकाशित हुआ है।

माधो राय से पहले भी मंडी रियासत से जुड़े थे हुरंग नाराय
शोध पत्र का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि देव श्री हुरंग नारायण की पूजा मंडी रियासत में माधो राय की स्थापना से कई दशक पहले से प्रचलित थी। चौहार घाटी के हुरंग गांव में स्थित देव श्री हुरंग नारायण को जल और अग्नि का देवता माना जाता है और वे क्षेत्र के प्राचीनतम लोकदेवताओं में से एक हैं।

राज्य के राजपत्रीय अभिलेखों के अनुसार मंडी रियासत के शासक राजा साहिब सेन (1554–1574 ई.) और उनकी रानी प्रकाश देई संतानहीन थे। उन्होंने हुरंग गांव में स्थित देव श्री हुरंग नारायण से मन्नत मांगी थी कि पुत्र प्राप्ति होने पर वे देवता को चांदी की प्रतिमा अर्पित करेंगे। मन्नत पूरी होने पर राजा के पुत्र का जन्म हुआ और उनका नाम नारायण सेन रखा गया, जो बाद में 1575 ई. में मंडी के शासक बने।

हुरंग नारायण मंदिर और रानी प्रकाश देई की आस्था शोध में उल्लेख है कि राजा साहिब सेन ने देवदार के वनों से घिरे क्षेत्र में देव श्री हुरंग नारायण का नया मंदिर बनवाया। रानी प्रकाश देई ने अपने झीर के हार से चांदी का मोहरा बनवाकर देवता को अर्पित किया। यही कारण है कि आज भी पूजा-पाठ के दौरान गुरु अपने मंत्रों में रानी प्रकाश देई का नाम बार-बार जपते हैं।
यह मंदिर पहाड़ी वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसकी लकड़ी से बनी संरचना और ढलानदार छत देव मांहूनाग मंदिर से साम्य रखती है।
शोध पत्र में कहीं भी कमरू मांहूनाग देवता का कोई ऐसा जिक्र नहीं किया गया कि मंडी रियासत के किसी राजा से कोई गहरी आस्था दिखाई गई हो, और नहीं तो शोध पत्र में ऐसा कोई उल्लेख किया है कि कमरू मांहूनाग देवता मंडी जनपद के कभी बड़ा देवता या किसी रूप में पूजा जाता रहा है।
माधो राय की स्थापना: सत्ता और भक्ति का नया चरणशोध के अनुसार मंडी शहर में माधो राय की स्थापना राजा सूरज सेन ने लगभग 1637 ई. में की। राजा सूरज सेन भी संतानहीन थे और संत माधो राय के संपर्क में आए। पुत्र प्राप्ति के बाद राजा ने मंडी को राजधानी बनाया और माधो राय को राज्य का इष्ट देव स्वीकार किया। इसके बाद मंडी के शासकों ने “माधो राय के नाम पर शासन” करने की परंपरा अपनाई, जिसका प्रमाण शिलालेखों और राजकीय अभिलेखों में मिलता है।
हुरंग नारायण से माधो राय तक
डॉक्टर संदीप राघव के शोध यह स्पष्ट करता है कि देव श्री हुरंग नारायण की पूजा मंडी रियासत की प्रारंभिक धार्मिक परंपरा का हिस्सा थी, जबकि माधो राय की स्थापना के साथ राज्य की धार्मिक-सत्ता संरचना को एक नया वैष्णव स्वरूप मिला। यह क्रम यह दर्शाता है कि मंडी रियासत में लोकदेवता परंपरा और राज्यदेव की अवधारणा एक-दूसरे की विरोधी नहीं बल्कि पूरक रही है।
खंडहर बनती विरासत पर चिंता
शोध पत्र में मंडी क्षेत्र की उपेक्षित ऐतिहासिक धरोहरों पर भी चिंता जताई गई है। राजगढ़, नारायणगढ़, चौवासीगढ़, पंगना और झेटिंगरी जैसे किले आज प्रशासनिक और सामाजिक लापरवाही के कारण खंडहर बनते जा रहे हैं।
पुरातत्व और सामाजिक इतिहास के महत्वपूर्ण प्रमाण
डॉक्टर संदीप राघव ने अपने शोध पत्र में यह भी प्रकाशित किया हुआ है कि माधो राय से जुड़े शिलालेख यह दर्शाते हैं कि सूरज सेन के बाद शासकों ने माधो राय के नाम पर शासन किया। वहीं बरसीले और त्रिलोक नाथ मंदिर से जुड़े प्रमाण मंडी क्षेत्र में सती प्रथा की तत्कालीन सामाजिक संरचना को उजागर करते हैं।
वास्तुकला के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि मंडी के अधिकांश प्राचीन मंदिर सितारा शैली में बने हैं और शिव को समर्पित हैं, जो शासकों की शैव आस्था को दर्शाते हैं। सुकेत (आधुनिक सुंदरनगर) के सूर्यकुंड, जगन्नाथ, महादेव और नरसिंह मंदिर शिखर शैली में निर्मित हैं, जो शैव और वैष्णव परंपराओं के सह-अस्तित्व का प्रमाण हैं।
डॉक्टर संदीप राघव के शोध पत्र न केवल देव श्री हुरंग नारायण की प्राचीनता को ऐतिहासिक रूप से स्थापित करता है, बल्कि यह भी सिद्ध करता है कि मंडी रियासत की धार्मिक परंपरा लोकदेवताओं से होते हुए राज्यदेव माधो राय तक एक सतत और समृद्ध सांस्कृतिक यात्रा रही है। लेकिन डॉक्टर संदीप राघव के शोध पत्र में अन्य किसी देवताओं की ऐसी प्राचीनता का कोई उल्लेख नहीं किया। डॉक्टर संदीप राघव का यह शोध पत्र का अध्ययन कर मंडी जिले की विरासत को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ दस्तावेज के रूप में सामने आया है।
