सुभाष ठाकुर*******
चौहार घाटी की रोपा पंचायत के कान्हग गांव के निवासी ज्ञामन सिंह रावत ने अपने घर पर ऑइस्टर मशरूम तैयार कर यह साबित कर दिया है कि क्षेत्र का युवा आत्मनिर्भर बनने के लिए पूरी तरह तैयार है। वहीं दूसरी ओर कृषि विभाग के आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर सामने आया है।

जानकारी के अनुसार, कृषि उपनिदेशक डॉ. रामाचंद्र द्वारा पधर कृषि उपकेंद्र को स्पष्ट आदेश दिए गए थे कि मृदा योजना के तहत चौहार घाटी की सभी पंचायतों में किसानों के खेतों की मिट्टी की जांच सुनिश्चित की जाए। लेकिन हकीकत यह रही कि पधर कृषि उपकेंद्र द्वारा केवल सनवाड़ और बथेरी पंचायत में एक दिन औपचारिक रूप से मिट्टी जांच की गई।
स्थानीय किसानों का आरोप है कि इसके बाद उन्हें यह कहकर टाल दिया गया कि आने वाले दिनों में घाटी की सभी पंचायतों में मिट्टी की जांच की जाएगी। लेकिन करीब 6 महीने बीत जाने के बाद भी न तो दोबारा कोई जांच हुई और न ही किसानों को उनकी मिट्टी की रिपोर्ट या मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध करवाए गए।
जब पधर कृषि उपकेंद्र के आंकड़े सामने आए और ‘अमर ज्वाला’ द्वारा जांच की गई, तो यह भी सामने आया कि कई जगहों पर मिट्टी के नमूने विभाग तक पहुंचे ही नहीं और जहां पहुंचे, वहां भी जांच प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। इससे विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
इसी बीच, रोपा पंचायत के युवा ज्ञामन सिंह रावत, जिन्होंने नौणी विश्वविद्यालय से मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लिया है, ने अपने घर के एक कमरे में गेहूं के भूसे से ऑइस्टर मशरूम तैयार कर क्षेत्र के युवाओं के लिए एक नई दिशा दिखाई है। उन्होंने 15 फरवरी 2026 के आसपास ऑइस्टर मशरूम के कुछ बैग तैयार करके मशरूम की फसल के लिए रखे हुए थे , उन बैगों से अब सफलतापूर्वक मशरूम उत्पादन किया है।
ज्ञामन सिंह का कहना है कि चौहार घाटी का स्वच्छ वातावरण मशरूम उत्पादन के लिए बेहद उपयुक्त है और यदि युवाओं को सही प्रशिक्षण व मार्गदर्शन मिले, तो उन्हें घर के पास ही रोजगार मिल सकता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि युवाओं को नौणी विश्वविद्यालय में विभिन्न प्रजातियों के मशरूम का प्रशिक्षण दिलाया जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि क्षेत्र के विकास के लिए जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए, ताकि वे बेरोजगार युवाओं को विभागीय योजनाओं का लाभ दिलाने में मदद कर सकें।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कृषि विभाग की कार्यप्रणाली अब “कुंभकर्णी नींद” जैसी प्रतीत हो रही है, जहां केवल कागजी आंकड़े बनाकर उच्च अधिकारियों को भेजे जा रहे हैं, जबकि जमीनी स्तर पर किसानों को योजनाओं का कोई वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा।
