दिल्ली प्रदर्शनकारी पुलिस की लाठी में लोहे की कील सहन रहा
सुभाष ठाकुर*******
हिंदुस्तान का क्रांतिकारी युवा तब जाग उठा, जब बार बार नीट के पेपर लीक कर युवाओं को अपना भविष्य अंधकार में दिखने लगा। दिल्ली में कॉकरोज जनता पार्टी यह आंदोलन इतिहास के उन पन्नों में अपनी जगह बना चुका है , जब भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 1974 का जयप्रकाश नारायण का छात्र-युवा आंदोलन आज भी एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। उसके बाद 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश में आपातकाल (इमरजेंसी) लागू किया गया, वर्तमान परिस्थिति को समय रहते सम्भाली नहीं गई तो वर्तमान हालात बेहद गंभीर दिखने लगे हैं। प्रधानमंत्री मोदी का वीडियो बयान भी यूं ही जारी नहीं हुआ कि न्यायिक व्यवस्था को और मजबूत बनाया जाएगा। पेपर लीक गंभीर घटना अब दिखाई दी।
दिल्ली पुलिस की कथित लोहे की कील लगी लाठी के प्रहार क्रांतिकारी युवाओं को सहने पड़े ,लेकिन क्रांतिकारी युवाओं के हौसले नहीं टूटे ।
जब उसे यह महसूस होने लगा कि वर्षों की मेहनत, पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के बावजूद उसका भविष्य लगातार अनिश्चित होता जा रहा है। जब भर्ती परीक्षाएँ बार-बार रद्द होने लगीं, पेपर लीक की घटनाएँ सामने आने लगीं, चयन प्रक्रियाओं पर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे तथा योग्य अभ्यर्थियों को अपने अधिकारों के लिए सड़कों और न्यायालयों का दरवाजा खटखटाना पड़ा, तब देश के पढ़े-लिखे युवाओं ने व्यवस्था से जवाब मांगना शुरू कर दिया।

आज रोजगार, भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता और पेपर लीक के मुद्दे पर युवाओं का असंतोष पूरे देश में दिखाई दे रहा है। लाखों अभ्यर्थियों का कहना है कि वर्षों की मेहनत के बाद भी परीक्षाओं का रद्द होना, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और पेपर लीक जैसी घटनाओं ने उनके भविष्य को प्रभावित किया है। युवाओं का मानना है कि उनकी मेहनत का सम्मान तभी होगा, जब भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध होगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान हर वर्ष लगभग दो करोड़ रोजगार के अवसर सृजित करने, विदेशों से काला धन वापस लाने, महंगाई पर नियंत्रण, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत, रुपये को मजबूत बनाने और “अच्छे दिन” लाने जैसे अनेक प्रमुख वादे किए थे। विपक्ष और सरकार के आलोचकों का कहना है कि इन वादों का बड़ा हिस्सा अपेक्षित रूप से पूरा नहीं हुआ, जबकि केंद्र सरकार का दावा है कि उसने बुनियादी ढाँचे के विकास, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप इंडिया, मुद्रा योजना, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) और अन्य योजनाओं के माध्यम से रोजगार तथा आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया है।

हाल के वर्षों में विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और कथित अनियमितताओं के मामलों ने युवाओं में गहरा रोष पैदा किया है। कई राज्यों में अभ्यर्थियों ने प्रदर्शन किए, निष्पक्ष जांच, दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई और पारदर्शी भर्ती व्यवस्था की मांग उठाई। आज यह केवल नौकरी का प्रश्न नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के भविष्य और व्यवस्था पर विश्वास का प्रश्न बन चुका है।

युवाओं की चिंता केवल प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित नहीं है। देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में भी नियुक्तियों की पारदर्शिता को लेकर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं। विभिन्न विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, प्रोफेसर और कुलपति पदों पर नियुक्तियों में पक्षपात, अनियमितता और राजनीतिक प्रभाव के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं। कई मामलों में न्यायालयों ने हस्तक्षेप किया, कुछ नियुक्तियाँ निरस्त हुईं, जबकि अनेक मामले आज भी विभिन्न न्यायालयों में विचाराधीन हैं।

हिमाचल प्रदेश के मंडी स्थित सरदार पटेल विश्वविद्यालय में शिक्षकों की नियुक्तियों को लेकर भी गंभीर शिकायतें उठाई गई थीं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि इस संबंध में प्रधानमंत्री कार्यालय तक लिखित शिकायत भेजी गई, लेकिन उनकी जानकारी के अनुसार प्रभावी जांच नहीं हुई और जिन शिक्षकों पर आरोप लगाए गए, वे आज भी अपने पदों पर कार्यरत हैं। इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक या आधिकारिक निष्कर्ष अभी शेष हैं।
इसी प्रकार केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला से संबंधित कुछ नियुक्तियों और शिक्षकों के विरुद्ध भी विभिन्न स्तरों पर विवाद और कानूनी मामले सामने आए हैं। इनमें से कई प्रकरण अभी न्यायालयों में लंबित हैं। इन घटनाओं ने उच्च शिक्षा संस्थानों में योग्यता-आधारित, पारदर्शी और निष्पक्ष नियुक्ति प्रणाली की आवश्यकता को लेकर गंभीर बहस खड़ी की है।
बेरोजगारी, महंगाई, सार्वजनिक ऋण और चुनावी वादों की पूर्ति को लेकर भी देश में लगातार राजनीतिक बहस जारी है। विपक्ष सरकार पर इन मुद्दों पर विफल रहने का आरोप लगाता है, जबकि सरकार अपनी उपलब्धियों और आर्थिक सुधारों का हवाला देती है। लेकिन इन राजनीतिक दावों और प्रतिदावों के बीच एक बात निर्विवाद रूप से सामने आई है—देश का युवा पहले की तुलना में कहीं अधिक जागरूक, सूचनाओं से लैस और अपने अधिकारों के प्रति सजग हो चुका है।
आज का युवा केवल रोजगार नहीं चाहता, बल्कि ऐसी व्यवस्था चाहता है जहाँ हर सरकारी नौकरी, हर विश्वविद्यालय नियुक्ति और हर चयन प्रक्रिया केवल योग्यता, पारदर्शिता और निष्पक्षता के आधार पर हो। वह चाहता है कि वर्षों की मेहनत का निर्णय किसी पेपर लीक, किसी अनियमितता या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा और परिश्रम से हो।
जब देश का पढ़ा-लिखा युवा अपने भविष्य, अपने अधिकारों और व्यवस्था में जवाबदेही की मांग को लेकर खड़ा होता है, तब यह किसी एक दल के पक्ष या विपक्ष की लड़ाई नहीं रह जाती। यह लोकतंत्र, सुशासन और समान अवसर की लड़ाई बन जाती है। शायद इसी कारण आज यह कहा जाने लगा है कि हिंदुस्तान का युवा अब सचमुच जाग उठा है।
