डॉ. अतुल ठाकुर बोले—आज़ाद हिन्द फ़ौज के वीरों के योगदान और उनके परिवारों के संघर्ष को देश कभी न भूले

अमर ज्वाला//मंडी 

आज़ाद हिन्द सरकार के 84वें स्थापना दिवस के अवसर पर हिमाचल स्वतंत्रता सेनानी परिषद ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस, इंडियन इंडिपेंडेंस लीग और आज़ाद हिन्द फ़ौज (आईएनए) के वीर सैनिकों के योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। परिषद के महासचिव डॉ. अतुल ठाकुर और अध्यक्ष जगदीश गुलेरिया ने सैनिक परिवारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। डॉ. अतुल ठाकुर ने इस अवसर पर ‘जय हिन्द’ के नारे और राष्ट्रगौरव से जुड़े कौमी तराने के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए देश की आज़ादी के इतिहास में आज़ाद हिन्द फ़ौज के योगदान को उचित सम्मान देने की आवश्यकता पर जोर दिया।

डॉ. ठाकुर ने कहा कि 21 अक्टूबर, 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर में आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की थी। यह स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार थी, जिसने स्वतंत्रता के लक्ष्य को साकार करने के लिए अपना प्रशासनिक ढांचा विकसित किया। उन्होंने कहा कि यह दिन केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले उन क्रांतिकारियों के साहस, संकल्प और बलिदान का प्रतीक है, जिन्होंने विदेशी शासन को चुनौती दी।

उन्होंने कहा कि देश की आज़ादी के इतिहास में आज़ाद हिन्द फ़ौज की भूमिका को वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वह हकदार थी। डॉ. ठाकुर ने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता के बाद आज़ाद हिन्द फ़ौज के अनेक सैनिकों और उनके परिवारों को अपेक्षित सम्मान तथा सहायता नहीं मिली। उन्होंने इस विषय पर इतिहास के पुनर्मूल्यांकन और सार्वजनिक चर्चा की आवश्यकता जताई।

डॉ. ठाकुर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश का भी आज़ाद हिन्द फ़ौज के इतिहास से गहरा संबंध रहा है। धर्मशाला से जुड़े कैप्टन राम सिंह ठाकुरी ने ‘क़दम-क़दम बढ़ाए जा’ की अमर धुन तैयार कर राष्ट्रीय चेतना को नई ऊर्जा दी। यह गीत आज भी देशभक्ति और सैनिक परंपरा का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के वीरों के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की जरूरत है।

उन्होंने आज़ाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों के सम्मान और उनके परिवारों की स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिन लोगों ने देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, उनके योगदान को याद रखना केवल सरकारों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने पूछा कि उन सैनिकों के परिवार आज कहां हैं, किस स्थिति में जीवन बिता रहे हैं और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं?

डॉ. ठाकुर ने कहा कि हर वर्ष विजयादशमी पर भगवान श्रीराम और उनकी सेना की विजय का स्मरण किया जाता है, लेकिन देश को विदेशी शासन से मुक्त कराने के लिए संघर्ष करने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों को भी उसी श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल आज़ाद देश में सांस लेना नहीं, बल्कि उन लोगों के संघर्ष और बलिदान को समझना भी है, जिन्होंने इस स्वतंत्रता की नींव रखी। ‘जय हिन्द’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान, एकता और देश के प्रति समर्पण का संदेश है।

डॉ. ठाकुर ने देशवासियों से आह्वान किया कि वे धर्म, जाति और नफरत की राजनीति से ऊपर उठकर भारत के गौरवशाली स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को जानें और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि यदि आज हम अपने स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को भूल गए, तो भविष्य की पीढ़ियों के सामने उनके संघर्ष और योगदान का उत्तर देना कठिन होगा।

इस अवसर पर परिषद ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस, आज़ाद हिन्द फ़ौज के वीर सैनिकों और देश की स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले सभी सेनानियों को नमन करते हुए उनके आदर्शों को जीवन में अपनाने का संदेश दिया।

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