कांग्रेस में भितरघात और भाजपा में मुख्यमंत्री चेहरे की चर्चा के बीच उम्मीदवारों के चयन की होगी असली परीक्षा
सुभाष ठाकुर*******
अमर ज्वाला करेगी सभी 68 विधानसभा क्षेत्रों का एक के बाद एक राजनीतिक विश्लेषण
हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों की सियासी बिसात बिछने लगी है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार दोबारा सत्ता में लौटने की तैयारी करेगी, वहीं भाजपा भी सत्ता में वापसी के लिए अपनी रणनीति तैयार करेगी। लेकिन चुनावी राजनीति का एक अहम पहलू यह है कि चुनाव से पहले टिकट आवंटन, उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़, संगठन की एकजुटता और पार्टी के भीतर संभावित भितरघात चुनावी मुकाबले को प्रभावित करते रहे हैं। ऐसे में दोनों प्रमुख दलों के लिए उम्मीदवारों का चयन एक बड़ी चुनौती होगा।
कांग्रेस के सामने अपनों की नाराजगी दूर करने की चुनौती
हिमाचल में कांग्रेस की सत्ता में वापसी का रास्ता केवल सरकार की उपलब्धियों से नहीं, बल्कि संगठन की जमीनी सक्रियता और टिकट आवंटन के फैसलों से भी जुड़ा होगा। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने अपने कार्यकाल में प्रदेश के हितों और सरकारी व्यवस्था में बदलाव को लेकर कई कदम उठाए हैं। इन फैसलों का चुनाव पर क्या असर पड़ेगा, यह आने वाले समय में जनता की प्रतिक्रिया से स्पष्ट होगा। क्योंकि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार के कोई भी मंत्री अपनी सरकार की योजनाओं को जनता के बीच जा कर नहीं रखते हुए सुनाई देते हैं । और नहीं सरकार के मंत्री जिलों में पहुंच कर प्रेस वार्ता कर सरकार के उपलब्धियों को आंकड़ों सहित खुलकर बता रही है।
हालांकि कांग्रेस के सामने एक अहम सवाल यह भी है कि क्या पार्टी उन कार्यकर्ताओं और समर्थकों को पर्याप्त राजनीतिक महत्व दे पाएगी, जिन्होंने पिछले चुनावों में संगठन के लिए मेहनत की थी? यदि जमीनी स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं की अनदेखी होती है और टिकट वितरण में स्थानीय जनसमर्थन के बजाय व्यक्तिगत समीकरणों को प्राथमिकता मिलती है, तो पार्टी के भीतर जबरदस्त असंतोष उभर सकता है। जिसका लाभ सीधे तौर पर भाजपा को मिलेगा।
कांग्रेस के लिए चुनौती केवल भाजपा के उम्मीदवारों से मुकाबला करने की नहीं होगी, बल्कि अपने ही संगठन में मौजूद मतभेदों को संभालने की भी होगी। चुनावों में टिकट न मिलने से नाराज नेता यदि पार्टी उम्मीदवारों के पक्ष में सक्रिय भूमिका नहीं निभाते, तो इसका असर चुनावी अभियान पर पड़ सकता है।
सर्वे और टिकट चयन की विश्वसनीयता पर उठेंगे सवाल
राजनीतिक दल चुनावों से पहले संभावित उम्मीदवारों की लोकप्रियता, क्षेत्रीय समीकरणों और जीत की संभावनाओं का आकलन करने के लिए सर्वे करवाते हैं। लेकिन सर्वे की उपयोगिता तभी है, जब उसमें जमीनी हकीकत, जनता की राय और स्थानीय संगठन की प्रतिक्रिया को निष्पक्षता से शामिल तो किया जाए साथ ही साथ यह जानना बेहद जरूरी है कि पिछले 15 से 20 वर्षों से व्यक्ति द्वारा पार्टी आर क्षेत्र के लिए तथा समाज के लिए क्या क्या उत्कृष्ट कार्य किए गए हैं ? ताकि टिकेट आवंटन होने पर आमजनता भी विचार करने में कोई संकोच न कर सके।
टिकट आवंटन की प्रक्रिया में यदि व्यक्तिगत संपर्क, गुटीय समीकरण या प्रभावशाली नेताओं की सिफारिशें जनसमर्थन पर भारी पड़ती हैं, तो पार्टी के सामने गलत उम्मीदवार चुनने का जोखिम पैदा हो सकता है। सर्वे टीमों की निष्पक्षता और रिपोर्टों की विश्वसनीयता को लेकर उठने वाले सवालों की जांच भी पारदर्शी प्रक्रिया से होनी चाहिए। हालांकि किसी विशेष सर्वे टीम पर पक्षपात या अनुचित लाभ लेने के आरोपों को प्रमाण के बिना तथ्य नहीं माना जा सकता।
कांग्रेस के लिए जरूरी होगा कि टिकट का आधार केवल बड़े नेताओं से नजदीकी नहीं, बल्कि उम्मीदवार की सामाजिक स्वीकार्यता, क्षेत्र में सक्रियता, जनता के मुद्दे उठाने का रिकॉर्ड और संगठन को साथ लेकर चलने की क्षमता भी बने।
दलबदल कर लौटने वालों को टिकट देने पर बढ़ सकता है असंतोष
कांग्रेस छोड़कर आम आदमी पार्टी या अन्य दलों में गए नेताओं की वापसी और उन्हें टिकट देने का फैसला भी पार्टी के भीतर चर्चा का विषय बन सकता है। ऐसे नेताओं को उम्मीदवार बनाने की स्थिति में पार्टी नेतृत्व को यह देखना होगा कि उनके पुराने समर्थकों, स्थानीय कार्यकर्ताओं और मौजूदा दावेदारों की क्या प्रतिक्रिया है।
यदि लंबे समय से संगठन के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज कर लौटे हुए नेताओं को प्राथमिकता दी जाती है, तो असंतोष बढ़ने की आशंका रहेगी। दूसरी ओर, किसी नेता का पुराना राजनीतिक इतिहास ही उसके वर्तमान जनसमर्थन का अंतिम पैमाना नहीं हो सकता। इसलिए निर्णय क्षेत्र की मौजूदा परिस्थितियों और उम्मीदवार की वास्तविक स्वीकार्यता के आधार पर होना चाहिए।
भाजपा में मुख्यमंत्री चेहरे और गुटीय समीकरणों की चर्चा
भाजपा के सामने भी टिकट आवंटन और संगठनात्मक एकजुटता से जुड़े सवाल हैं। प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा, हमीरपुर से सांसद अनुराग ठाकुर, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राजीव बिंदल, कांगड़ा से भाजपा में शामिल हुए सुधीर शर्मा और सुंदरनगर से विधायक राकेश जम्वाल जैसे नेताओं की राजनीतिक भूमिका को लेकर चर्चाएं होती रही हैं।
हालांकि इन नेताओं को मुख्यमंत्री पद का दावेदार चर्चाओं में शामिल हैं। भाजपा के लिए मुख्यमंत्री चेहरे का सवाल राजनीतिक चर्चा का विषय बना रह सकता है, लेकिन पार्टी का अंतिम निर्णय उसके केंद्रीय नेतृत्व और संगठन की रणनीति पर निर्भर करेगा।
यदि चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद के चेहरे की घोषणा होती है, तो उसके संगठनात्मक और चुनावी प्रभाव का आकलन करना होगा। वहीं, यदि पार्टी सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ती है, तो उसे सभी प्रमुख नेताओं के बीच समन्वय बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
भाजपा के सामने भी राष्ट्रीय मुद्दों पर जवाब देने की चुनौती
केंद्र सरकार की नीतियां और राष्ट्रीय मुद्दे भी हिमाचल के चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के आरोप, नीट परीक्षा से जुड़े विवाद और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर उठने वाले राजनीतिक सवाल चुनावी बहस का हिस्सा बन सकते हैं।
विपक्ष इन मुद्दों पर केंद्र सरकार को घेर सकता है, जबकि भाजपा को अपने पक्ष और नीतियों के आधार पर जवाब देना होगा। इन मुद्दों का हिमाचल के मतदाताओं पर कितना प्रभाव पड़ेगा, यह स्थानीय परिस्थितियों, चुनावी प्रचार और जनता की प्राथमिकताओं से तय होगा।
चेहरों से ज्यादा जरूरी जनता के बीच पकड़
हिमाचल की राजनीति में टिकट आवंटन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उम्मीदवार कितनी बार चुनाव हार चुका है। किसी नेता का दो या तीन बार चुनाव हारना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह अगली बार भी चुनाव नहीं जीत सकता। इसी तरह, नया चेहरा होना अपने आप में जीत की गारंटी नहीं है।
उम्मीदवार के पिछले चुनावी प्रदर्शन, वर्तमान जनसंपर्क, क्षेत्र में सक्रियता, सामाजिक समीकरणों, संगठनात्मक समर्थन और जनता के मुद्दों पर उसकी भूमिका का समग्र आकलन जरूरी है। राजनीतिक दलों को यह भी देखना होगा कि उम्मीदवार केवल नेताओं के कार्यक्रमों में उपस्थिति दर्ज करवाने या सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करने तक सीमित तो नहीं है।
