खोजी पत्रकारिता पर कानूनी बंदिश की तैयारी ?

मोदी सरकार मीडिया को कानूनी तौर पर ‘गोदी मीडिया’ बनाना चाहती है?

 डिजिटल डेटा संरक्षण कानून पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा विवाद; पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों, भ्रष्टाचार की पड़ताल और जनता के जानने के अधिकार पर उठे गंभीर सवाल

सुभाष ठाकुर*******

सत्ता से सवाल पूछना पत्रकारिता का धर्म है, लेकिन यदि सवाल पूछने, दस्तावेजों की पड़ताल करने और भ्रष्टाचार से जुड़े तथ्यों को जनता तक पहुंचाने के रास्ते में कानूनी अड़चनें बढ़ने लगें, तो लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और इससे संबंधित नियमों के कुछ प्रावधानों को लेकर अब यही बहस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने कानून के कुछ प्रावधानों को चुनौती देते हुए दलील दी है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी रिपोर्टिंग और गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए कानून में जनहित की खोजी पत्रकारिता को पर्याप्त संरक्षण क्यों न दिया जाए? क्या सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि पत्रकार किसी सरकारी संस्थान, भर्ती प्रक्रिया या सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की भूमिका की पड़ताल करते समय अनावश्यक कानूनी दबाव में न आएं?

विपक्षी दलों और सरकार के आलोचकों की ओर से पहले भी मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। अब डेटा संरक्षण कानून के कुछ प्रावधानों पर पत्रकार संगठनों की आपत्तियों ने इस बहस को नया आधार दिया है। हालांकि, यह कहना कि सरकार का घोषित उद्देश्य मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ बनाना है, उपलब्ध तथ्यों से सिद्ध नहीं होता। लेकिन कानून के संभावित प्रभावों पर सवाल पूछना और पत्रकारिता के लिए स्पष्ट सुरक्षा की मांग करना लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा है।

फर्जी नियुक्तियों और पेपर लीक का पर्दाफाश कौन करेगा?

ऐसी खोजी पत्रकारिता फिर कैसे होगी ?

देश के उच्च शिक्षण संस्थानों और प्रशिक्षण संस्थानों में कथित फर्जी नियुक्तियों, भर्ती प्रक्रियाओं में अनियमितताओं तथा पेपर लीक जैसे मामलों की पड़ताल में खोजी पत्रकारिता की अहम भूमिका रहती है। ऐसे मामलों में दस्तावेज, आधिकारिक रिकॉर्ड और संस्थानों के भीतर से मिलने वाली जानकारी महत्वपूर्ण हो सकती है।

यदि किसी पत्रकार को किसी कथित अनियमितता की खबर प्रकाशित करने के लिए व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल से संबंधित कानूनी दायित्वों का सामना करना पड़े, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जनहित की पड़ताल किस तरह प्रभावित होगी। डीएनपीए की आपत्तियों का एक प्रमुख पहलू भी यही है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट के अभाव में रिपोर्टिंग कठिन हो सकती है।

अमर ज्वाला का सवाल है,यदि किसी संस्थान में नियुक्तियों को लेकर गंभीर शिकायतें हों, तो क्या पत्रकार को खबर में संबंधित व्यक्ति की भूमिका सामने लाने से पहले उसी की सहमति लेनी चाहिए? कानून की वास्तविक प्रयोज्यता और इसकी सीमाओं का निर्धारण अदालत को करना है, लेकिन सरकार को इस आशंका पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।

मतदाता सूचियों और चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों की ओर से समय-समय पर गंभीर आरोप लगाए जाते रहे हैं। ऐसे मामलों में आरोपों को प्रमाणित तथ्य मानने के बजाय दस्तावेजों, आधिकारिक आंकड़ों और स्वतंत्र जांच के आधार पर उनकी पुष्टि करना जरूरी है। यही जिम्मेदार पत्रकारिता की कसौटी है।

लेकिन यदि पत्रकारों को चुनावी प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों और डिजिटल जानकारी की पड़ताल में कानूनी अनिश्चितता का सामना करना पड़े, तो स्वतंत्र जांच पर उसके संभावित प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में सरकार, विपक्ष, निर्वाचन संस्थाओं और सार्वजनिक अधिकारियों—सभी से तथ्यात्मक सवाल पूछने की स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए।

कौन करेगा ये फिर यह पत्रकारिता ?  क्या ऐसी खबर लिखने के लिए यह भ्रष्टाचारी  अपने काले कारनामों को सार्वजनिक करने की अनुमति पत्रकार को देंगे क्या ?

खोजी पत्रकारिता में कई बार संस्थानों के कर्मचारी या अधिकारी ऐसी जानकारी सामने लाते हैं, जो सार्वजनिक जवाबदेही के लिए महत्वपूर्ण होती है। यदि उन्हें आशंका हो कि उनकी पहचान उजागर हो सकती है या सूचना साझा करने के कारण उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ेगा, तो वे आगे आने से बच सकते हैं।

डीएनपीए ने कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर गोपनीय सूत्रों और पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर संभावित प्रभाव की चिंता जताई है। ऐसे में केंद्र सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि जनहित में जानकारी देने वाले सूत्रों की सुरक्षा और पत्रकारों की स्वतंत्र पड़ताल के लिए कौन-से प्रभावी उपाय उपलब्ध हैं।

केंद्र सरकार का पक्ष है कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून नागरिकों की निजी जानकारी की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। डिजिटल माध्यमों में निजी डेटा का दुरुपयोग रोकना निस्संदेह आवश्यक है। लेकिन निजता की सुरक्षा और सार्वजनिक हित में की जाने वाली खोजी पत्रकारिता के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

किसी नागरिक की निजी जानकारी का अनुचित प्रकाशन और सरकारी कामकाज में कथित अनियमितताओं की दस्तावेज-आधारित जांच अलग-अलग परिस्थितियां हैं। कानून में ऐसी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे निजता का अधिकार सुरक्षित रहे और जनहित में तथ्यों को सामने लाने वाले पत्रकार अनावश्यक कानूनी बाधाओं में न फंसें।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, केंद्र से जवाब तलब

27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने डीएनपीए की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। मामले में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम के कुछ प्रावधानों और सूचना का अधिकार अधिनियम में किए गए संबंधित संशोधन को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं की दलील है कि इन प्रावधानों से पत्रकारिता और जनहित में सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है और न ही चुनौती दिए गए प्रावधानों पर रोक लगाई है। अंतिम निर्णय अदालत को करना है।

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