चौहार घाटी में आज भी जिंदा है पारंपरिक हुनर, जंगलों से नंगाल लाकर जीवन यापन कर रहे कई परिवार

सुभाष ठाकुर*******

चौहार घाटी की बथेरी पंचायत (पधर) के झावे राम और उनकी पत्नी राम प्यारी आज भी अपने पुश्तैनी हुनर को संजोए हुए कठिन परिस्थितियों में मेहनत कर परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। यह दंपति दूर-दूर के जंगलों से “हरी नंगाल” के गट्ठे लाकर पहले उन्हें सुखाते हैं, फिर तेज धार वाली दराटी से बारीकी से काटकर किल-किलटे, टोकरियां और पटारू जैसे पारंपरिक उपयोगी सामान तैयार करते हैं।

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इन उत्पादों को बनाने में जहां दिन-रात की मेहनत लगती है, वहीं यह काम उनके जीवन का मुख्य सहारा भी बना हुआ है। झावे राम बताते हैं कि उन्होंने यह कला अपनी माता से सीखी है और अब अपनी पत्नी को भी यह हुनर सिखाकर दोनों मिलकर आजीविका चला रहे हैं।

हालांकि सरकार द्वारा कृषि और बागवानी विभाग के माध्यम से प्लास्टिक के विकल्प अनुदान पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं, लेकिन झावे राम का कहना है कि ये सुविधाएं अक्सर आम और जरूरतमंद किसानों तक नहीं पहुंच पातीं, बल्कि सीमित दायरे में ही रह जाती हैं।

नोखा राम हिमाचली टोपी के कारीगर है इनकी सप्लाई विभिन्न जगह जाती है । नोखा राम अपने परिवार की आजीविका इस कारोबार में खुद तो काम करते हैं साथ ही साथ अन्य को भी रोजगार दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह खुद विभिन्न डिजाइनों में टोपियों को तैयार करते हैं किसी के बड़े ऑडर मिलने पर भी उन्हें समय के साथ पूरा किया जाता है ।उन्होंने कहा कि टोपी की सामग्री काफी मंहगी हुई है इसलिए टोपियों की कीमत मंहगी होने लगी है।,यहां पर हर प्रकार की टोपियां बनाई जाती है ।जिसे कुल्लू के विभिन्न शोरूम में भेजी जाती है।
oplus_0नोखा राम हिमाचली टोपी के कारीगर है इनकी सप्लाई विभिन्न जगह जाती है । नोखा राम अपने परिवार की आजीविका इस कारोबार में खुद तो काम करते हैं साथ ही साथ अन्य को भी रोजगार दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह खुद विभिन्न डिजाइनों में टोपियों को तैयार करते हैं किसी के बड़े ऑडर मिलने पर भी उन्हें समय के साथ पूरा किया जाता है ।उन्होंने कहा कि टोपी की सामग्री काफी मंहगी हुई है इसलिए टोपियों की कीमत मंहगी होने लगी है।,यहां पर हर प्रकार की टोपियां बनाई जाती है ।जिसे कुल्लू के विभिन्न शोरूम में भेजी जाती है।

उन्होंने यह भी चिंता जताई कि पहले इन उत्पादों के निर्माण में “कश्माले” के पौधे की लकड़ी का अधिक उपयोग होता था, लेकिन अब इसके अत्यधिक दोहन (खनन) के कारण इसकी उपलब्धता कम हो गई है, जिससे उनके पारंपरिक काम पर असर पड़ा है। मजबूरी में अब उन्हें अन्य लकड़ियों का सहारा लेना पड़ रहा है।

इसके बावजूद झावे राम और राम प्यारी न केवल इस पारंपरिक शिल्प को जीवित रखे हुए हैं, बल्कि हिमाचली संस्कृति की पहचान ‘हिमाचली टोपी’ का निर्माण भी कर रहे हैं।

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यह दंपति आज भी यह साबित कर रहा है कि कठिन परिस्थितियों में भी मेहनत और परंपरा के सहारे आत्मनिर्भर बना जा सकता है, लेकिन आवश्यकता है कि ऐसे कारीगरों को सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ मिले, ताकि यह विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।

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प्रदेश सरकार को चाहिए कि इन सभी मेहनत काश परिवारों के हाथों को मजबूत करने के लिए कृषि और बागवानी विभाग के साथ समझौता कर इनकी यह सभी उत्पादों को अच्छे दामों में खरीद करें ताकि विलुप्त होता यह रोजगार का साधन आने वाले  बेरोजगारों को मिलता रहे।

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