सुभाष ठाकुर*******
चौहार घाटी की सनवाड़ पंचायत के तरवांनू गांव में स्थित सैकड़ों वर्ष पुराना पत्थर और लकड़ी से निर्मित चार मंजिला मकान आज भी अपनी मजबूती और अद्भुत कारीगरी के साथ अडिग खड़ा है। यह मकान केवल एक आवास नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों की यादों, परंपराओं और इतिहास का जीवंत प्रतीक बन चुका है।

प्राचीन शैली में बना यह मकान समय की कसौटी पर खरा उतरते हुए आज भी जस का तस खड़ा है। मकान चार मंजिला जिसमें धरातल में गौशाला जिसमें गैय्य, बैल,तथा भेड़ – बकरियों का पालन पोषण किया जाता है, उससे ऊपर दूसरी और तीसरी मंजिल में परिवार के सदस्यों तथा चौथी मंजिल में अनाज को संरक्षित रखा जाता था मकान की हर मंजिल की ऊंचाई 7 से 8 फुट की ऊंचाई वाली यह मंजिल सर्दियों में गर्म और गर्मी में ठंडक यानी मकान का तापमान एक समान रहता है जिसे पत्थर और लकड़ियों के साथ खड़ा किया हुआ है ऐसे मकानों की मिट्टी और गोबर की लिपाई की जाती थी।
इसकी दीवारों और लकड़ी की संरचना में न जाने कितनी पीढ़ियों की जिंदगी, संघर्ष और सुख-दुख की कहानियां समाई हुई हैं। गांव के लोगों के लिए यह मकान केवल एक भवन नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों की विरासत और पहचान है, जिसे देखते ही पुरानी यादें ताजा हो उठती हैं।
जहां आज के आधुनिक दौर में सीमेंट और कंक्रीट के आलीशान मकान तेजी से बन रहे हैं, वहीं यह प्राचीन मकान अपनी मजबूती और टिकाऊपन के कारण उन सभी को चुनौती देता नजर आता है। समय के साथ जहां आधुनिक भवनों की चमक फीकी पड़ जाती है, वहीं यह पुराना मकान आज भी अपनी शान और असली रंगत के साथ खड़ा है।
मकान के मालिक बीरी सिंह जो एक सेवानिवृत शिक्षक के अनुसार, इस ऐतिहासिक धरोहर की वास्तविक उम्र जानने के लिए IIT Mandi के वैज्ञानिकों द्वारा शोध कार्य शुरू करने के लिए यहां पहुंचे हुए थे । वैज्ञानिक लकड़ी, मिट्टी और पत्थर की कार्बन डेटिंग के माध्यम से इसकी सही आयु का पता लगाने में जुटे हैं।
यह मकान न केवल एक ऐतिहासिक धरोहर है, बल्कि इसे “हेरिटेज हाउस” के रूप में विकसित किए जाने की अपार संभावनाएं भी हैं। यदि सरकार और पुरातत्व विभाग इस दिशा में पहल करे, तो यह स्थान पर्यटन के नक्शे पर एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि इस मकान को हेरिटेज घोषित कर संरक्षित किया जाए और क्षेत्र में सड़क व अन्य सुविधाओं का विकास किया जाए, तो यहां देश-विदेश से पर्यटकों की आवाजाही बढ़ सकती है। इससे न केवल इस अनमोल धरोहर का संरक्षण होगा, बल्कि क्षेत्र में रोजगार और विकास के नए अवसर भी पैदा होंगे।
यह मकान सिर्फ पत्थर और लकड़ी का ढांचा नहीं, बल्कि चौहार घाटी की संस्कृति, इतिहास और गौरव का जीवंत उदाहरण है—जो आज भी आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रहा है।
