पंजोंड में माता फुगनी मंदिर प्रतिष्ठा महोत्सव: देव परंपरा, आस्था और इतिहास का भव्य संगम

सुभाष ठाकुर*******

बरोट क्षेत्र की धमचयान पंचायत के पंजोंड में माता फुगनी जी के भव्य मंदिर की प्रतिष्ठा में शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस पावन अवसर पर क्षेत्र ही नहीं, बल्कि मंडी और कुल्लू से देव समाज से जुड़े अनेकों मंदिरों की देवी-देवता कमेटियां भी शामिल हुईं, जिससे पूरा क्षेत्र भक्ति और उत्सव के रंग में रंग गया।

 

इस दौरान पूर्व मंत्री ठाकुर कौल सिंह, विधायक पूर्ण ठाकुर के साथ-साथ सर्व देवता कमेटी के प्रधान पंडित शिवपाल शर्मा ने भी माता के मंदिर में शीश नवाकर आशीर्वाद प्राप्त किया।

चौहार घाटी की सभी 14 पंचायतों में स्थापित देवी-देवताओं की कमेटियों द्वारा इस धार्मिक आयोजन को प्राचीन परंपरा के अनुसार एक बड़े उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। यह आयोजन 23 अप्रैल से 26 अप्रैल तक चल रहा है, जिसमें हजारों श्रद्धालु माता फुगनी के मंदिर में अपनी हाजिरी भर रहे हैं।

धार्मिक कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालु माता रानी की भक्ति में झूमते नजर आए और भजन-कीर्तन के साथ नृत्य कर अपनी आस्था व्यक्त की। वहीं, विभिन्न देवता कमेटियां अपनी-अपनी देवी-देवताओं की ओर से प्रसाद भी लेकर पहुंच रही हैं। इस प्रसाद में हलवा, फल-फ्रूट तथा अन्य स्वेच्छा से लाए गए भोग शामिल हैं, जो इस आयोजन की भव्यता को और बढ़ा रहे हैं।

माता फुगनी का प्राचीन इतिहास:

चौहार घाटी के पंजोंड में विराजमान माता फुगनी का इतिहास मंडी रियासत से जुड़ा हुआ है। जनश्रुतियों के अनुसार, मंडी रियासत के राजा माता को कोलकाता से लेकर आए थे और अपने राज परिवार के मंदिर में स्थापित कर विधिवत पूजा-अर्चना करते थे।

कहा जाता है कि राजा प्रतिदिन माता की मूर्ति को स्वच्छ जल से स्नान कराकर पूजा करते थे। माता को स्नान कराने के लिए चौहार घाटी के पंजोंड की पहाड़ी के पीछे स्थित हिमखंड से बर्फ का गोला किल्लेट में भरकर मंडी लाया जाता था।

इस बर्फ में चौहार घाटी की ऊंची पहाड़ियों में पाई जाने वाली दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियों का प्रभाव होता था। इनमें ‘लोहसर’ नामक सुगंधित सफेद फूल विशेष महत्व रखता है, जो बरसात के मौसम में खिलता है और देव समाज में अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस फूल को मंदिरों में चढ़ाया जाता है और इसकी सुगंध अद्भुत मानी जाती है।

जनश्रुतियों के अनुसार, इसी दिव्य सुगंध के प्रभाव से माता ने एक समय मंडी राज परिवार का महल छोड़ दिया और अदृश्य रूप में बर्फ के खाली किल्लेट में विराजमान होकर फूटाखल मार्ग से होते हुए पंजोंड पहुंचीं। तभी से माता फुगनी का यह स्थान आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया और आज भी श्रद्धालुओं के बीच इसकी गहरी मान्यता बनी हुई है।

यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि चौहार घाटी की समृद्ध देव संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता का भी जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

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