अमर ज्वाला//डैस्क
इंदौर (मध्य प्रदेश)। इन दिनों राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में मध्य प्रदेश का एक ऐसा सरकारी अस्पताल है, जो जमीन पर नहीं बल्कि सरकारी फाइलों में चलता रहा। इंदौर के खजराना क्षेत्र के लिए वर्ष 2020 में स्वीकृत 100 बिस्तरों वाला सिविल अस्पताल छह वर्षों बाद भी धरातल पर अस्तित्व में नहीं आ सका। हैरानी की बात यह है कि अस्पताल के लिए न भवन बना, न एक ईंट रखी गई, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उसके लिए 87 पद स्वीकृत कर दिए गए और कर्मचारियों की तैनाती तथा तबादले भी होते रहे।
मामला उजागर होने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विपक्ष ने इसे प्रशासनिक विफलता बताते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की है, जबकि सरकार का कहना है कि भूमि हस्तांतरण में देरी के कारण भवन निर्माण शुरू नहीं हो सका और स्वीकृत कर्मचारियों को अन्य सरकारी अस्पतालों में कार्यरत रखा गया।
यह मामला अब केवल एक अस्पताल का नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं की निगरानी, जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता का प्रतीक बन गया है। पूरे देश में इस ‘कागज़ी अस्पताल’ की चर्चा हो रही है और लोग पूछ रहे हैं कि जब अस्पताल का अस्तित्व ही नहीं था, तो वर्षों तक सरकारी रिकॉर्ड में वह संचालित कैसे दिखता रहा?
अब सभी की निगाहें विभागीय जांच पर टिकी हैं, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही थी या नियमों के उल्लंघन का कोई बड़ा मामला।
