लाठियों से नहीं दबेगी युवाओं की आवाज़: सवालों से बचने की राजनीति कब तक?

नीट विवाद, युवाओं के प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई ने सरकार की जवाबदेही पर फिर खड़े किए सवाल

सुभाष ठाकुर*******

दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई ने पूरे देश में नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो और तस्वीरों ने लोगों को झकझोर दिया। घायल युवाओं के चेहरे और उनके आक्रोश ने यह सवाल खड़ा किया है कि लोकतंत्र में अपनी बात रखने वालों के साथ व्यवहार कैसा होना चाहिए।

मेरी राय में, पिछले कुछ वर्षों में नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने देश के लाखों युवाओं का विश्वास कमजोर किया है। युवाओं की मांग है कि परीक्षा प्रणाली पारदर्शी हो और जिम्मेदारी तय हो। सरकार से अपेक्षा है कि वह इन सवालों का जवाब दे। जिसके चलते युवाओं ने केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की हुई है जिसे केंद्र सरकार ने उनकी सुनवाई तक नहीं की पिछले 23 दिनों तक जिसका अकोरा युवाओं में बढ़ता गया।

इसी तरह, अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े वित्तीय और प्रशासनिक मामलों को लेकर भी सार्वजनिक चर्चा हो चुकी है कि भगवान राम मंदिर में करोड़ों लोगों की आस्था के साथ ट्रस्ट में शामिल लोगों ने चढ़ावा चोरी कर मंदिर परिसर को अपना  व्यवसाय समझ चुके थे ।भगवान राम मंदिर में हुई  किसी प्रकार की अनियमितता के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए ताकि भगवान राम के नाम पर श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहे। पूरी दुनिया में देश का नाम बदनाम उन ट्रस्ट से जुड़े लोगों द्वारा यह चंदा चढ़ावा चोरी का कृत किया हुआ है।

लोकतंत्र में जनता सवाल पूछती है और सरकार जवाब देती है। यदि विरोध प्रदर्शनों का जवाब संवाद की बजाय बल प्रयोग से दिया जाता है, तो असंतोष और बढ़ सकता है। देश के युवाओं की आवाज़ को सुनना और उनकी समस्याओं का समाधान करना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी है।

आज देश में यह बहस तेज है कि सरकार को आलोचना का जवाब संवाद से देना चाहिए या टकराव से। अंतिम फैसला जनता ही चुनाव में करती है। लोकतंत्र में किसी भी सरकार की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है, और वही उसकी सबसे बड़ी परीक्षा भी।

 

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