सेरी के पास पुलिस ने दबोचा अशोक लेलैंड वाहन HP36D-1815, चालक अंशुल के खिलाफ भारतीय वन अधिनियम के तहत मामला
अमर ज्वाला//जोगिंदर नगर
चील के जंगलों से बिरोजे की कथित अवैध निकासी और उसके परिवहन को लेकर उठ रहे सवालों के बीच जोगिंदरनगर पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। पुलिस ने सेरी के पास नाकाबंदी के दौरान **150 टिन बिरोजे से लदा अशोक लेलैंड वाहन नंबर HP36D-1815 पकड़ा है। वाहन में बिरोजे को तिरपाल के नीचे छिपाकर ले जाया जा रहा था।
पुलिस के अनुसार वाहन की तलाशी लेने पर उसमें 150 टिन बिरोजा बरामद हुआ। पूछताछ के दौरान वाहन चालक बिरोजे के परिवहन से संबंधित कोई वैध परमिट अथवा लाइसेंस पेश नहीं कर सका।
इस मामले में जोगिंदरनगर पुलिस ने मामला दर्ज संख्या 151/26 किया है। पुलिस ने कार्रवाई भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 41 और 42 के तहत यह मामला दर्ज कर दिया है।
मामले में पुलिस ने वाहन चालक एवं मालिक अंशुल तहसील खुंडियां, जिला कांगड़ा, उम्र 25 वर्ष को नामजद किया है।
पुलिस के मुताबिक उसे बिरोजे की अवैध खेप के परिवहन संबंधी विश्वसनीय सूचना मिली थी। इसके बाद सेरी के पास वाहन HP36D-1815 को रोककर तलाशी ली गई। वाहन पर तिरपाल डाला गया था। तलाशी के दौरान तिरपाल के नीचे बड़ी मात्रा में बिरोजे के टिन बरामद हुए।
एक साथ 150 टिन बिरोजे की बरामदगी ने मामले को गंभीर बना दिया है। खास बात यह है कि वाहन चालक मौके पर बिरोजे के परिवहन के लिए आवश्यक वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाया।
दो टिन नमूने के तौर पर कब्जे में, 148 टिन वन विभाग के हवाले
पुलिस ने बरामद बिरोजे में से दो टिन नमूने के तौर पर कब्जे में लिए, जबकि शेष 148 टिन बिरोजा तथा बरामद वाहन को वन विभाग के वन परिक्षेत्र अधिकारी, जोगिंदरनगर के सुपुर्द किया गया है।
अब जांच का अहम हिस्सा यह पता लगाना होगा कि इतनी बड़ी मात्रा में बिरोजा **कहां से निकाला गया और इसे कहां ले जाया जा रहा था। कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिना वैध परमिट के 150 टिन बिरोजा वाहन में लोड होकर सड़क तक कैसे पहुंचा ? यदि बिरोजे की निकासी और परिवहन पर विभागीय निगरानी व्यवस्था प्रभावी है, तो इतनी बड़ी खेप बिना वैध दस्तावेजों के परिवहन के लिए कैसे निकल गई? पुलिस की कार्रवाई ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है।
क्या जंगल से बाजार तक सक्रिय है कोई नेटवर्क ?
मामला केवल एक वाहन और 150 टिन की बरामदगी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। क्योंकि हिमाचल प्रदेश के सैकड़ों व्हील के जंगलों में वन विभाग के गार्ड और वन परिक्षेत्र की सहमति बिना चील के लाखों पेड़ों को बिना मार्का से बिरजा निकासी हो ही नहीं सकता है और जंगलों से सड़क तक बिरोजा से भरे हुए सैकड़ों तीनों की ढुलाई की जानकारी कैसे छुपाई जाती है । जांच में यह भी सामने आना जरूरी है कि **बिरोजा कहां से प्राप्त हुआ, किसने वाहन में लोड कराया, किसके कहने पर इसे ले जाया जा रहा था और इसकी अंतिम मंजिल क्या थी।
यदि जांच में अवैध निकासी की पुष्टि होती है तो पुलिस और वन विभाग को यह भी खंगालना होगा कि इसके पीछे केवल एक व्यक्ति था या **जंगल से लेकर परिवहन और बाजार तक कोई बड़ा नेटवर्क सक्रिय है।
