आखिरकार बहुत लंबे इंतजार के बाद मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के नाम से सरकारी बस सेवा लौट आयी है। जैसा हमारे राजनीतिक और सामाजिक जीवन में हमेशा होता है वैसा ही अब इस बस सेवा के साथ भी हो रहा है। चौक चौराहों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बस की उम्र और रंग पर बहस शुरू हो गई है। कोई बस को पुरानी बता रहा है, कोई नए रंग को देख रहा है। लेकिन वास्तविकता के धरातल पर सरकारी परिवहन की कहानी बस के रंग से शुरू नहीं होती, वह गांव की उस सड़क से शुरू होती है, जहां निजी बस इसलिए नहीं पहुंचती क्योंकि वहां यात्री कम हैं,खर्चे ज्यादा है और कमाई कम इसीलिए आम ग्रामीण इलाकों में सरकारी परिवहन की उपयोगिता और आवश्यकता दिखाई देती है।
निजी बस के लिए रूट तभी टिकाऊ है, जब यात्री पर्याप्त हों और आमदनी से डीजल, ड्राइवर, कंडक्टर, परमिट और रखरखाव का खर्च निकलने के बाद मुनाफा बचे। सरकार के लिए किसी रूट की उपयोगिता का पैमाना इससे ज्यादा अपेक्षा रखता है। किसी गांव को तहसील से जोड़ना, किसी छात्र को स्कूलों और कॉलेज तक पहुंचाना, मरीज को अस्पताल ले जाना या किसान को मंडी तक पहुंचने का साधन देना भी सार्वजनिक परिवहन की जिम्मेदारी है, इसमें सुख दुख में अपने अपनों का साथ देना, होली दीवाली पर बेटे बहुओं का गांव आना,राखी पर बेटियों का मायके आना भी शामिल है। इसलिए मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा को समझने का सही पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि बस बाहर से कैसी दिखती है। असली पैमाना यह है कि वह कहां से कहां तक जाती है और किसके लिए जाती है।
मध्य प्रदेश सड़क परिवहन निगम के बंद होने के बाद प्रदेश में सरकारी बस सेवा समाप्त हो गई थी। बड़े और व्यस्त रूट निजी ऑपरेटरों के भरोसे चलते रहे, लेकिन कम यात्री वाले इलाकों में परिवहन की कमी बनी रही। निगम का घाटा तो खत्म हो गया, लेकिन बस की जरूरत खत्म नहीं हुई और आम आदमी परेशानी झेलता रहा।
अब सरकार ने फिर सार्वजनिक परिवहन की जिम्मेदारी का एक हिस्सा अपने हाथ में लिया है। इसे सिर्फ सरकारी बसों की वापसी मानना सही नहीं होगा। यहां यह समझना भी जरूरी है कि यह उन रूटों तक पहुंच बनाने की कोशिश भी है, जहां बाजार अपने हिसाब से परिवहन उपलब्ध नहीं करा पाता।
सरकार का दावा है कि अंतरनगरीय एवं अंतरराज्यीय सेवा के तहत अगले पांच साल में 3500 से ज्यादा मार्गों पर 15 हजार से ज्यादा बसें चलाने की योजना है। छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों तक सफर आसान बनाने के साथ भरोसेमंद परिवहन उपलब्ध कराने की बात कही गई है।
यह आंकड़ा अपने आप में बड़ा है। लेकिन 15 हजार बसों का बेड़ा खड़ा करना और 15 हजार बसों को जरूरत वाले रूट पर चलाना दो अलग बातें हैं। योजना की असली तस्वीर तब बनेगी, जब इन बसों का विस्तार बड़े शहरों से निकलकर उन इलाकों तक पहुंचेगा जहां आज भी परिवहन के साधन सीमित है।
पुरानी बस होना और खराब बस होना एक बात नहीं है। किसी बस की सुरक्षा उसकी उम्र से ज्यादा उसकी तकनीकी स्थिति और फिटनेस पर निर्भर करती है। रंग से ज्यादा किसी ग्रामीण के लिए यह ज्यादा मायने रखता है कि वह समय पर सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंच सके।
25 सितंबर को मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के शुभारंभ पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने अपने खास अंदाज में कहा कि कुछ आरटीओ अफसर ‘गांधीवादी’ हैं, गांधी के नोट देखते ही तेजी दिखाते हैं। उन्होंने गलत बस को पास नहीं करने की चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसा करने वाले अधिकारियों की नौकरी जाएगी। बयान की भाषा भले ही गडकरी के अंदाज वाली हो, लेकिन इसका प्रशासनिक संदेश सीधा सपाट है कि सड़क पर उतरने वाली बस की फिटनेस में कोई समझौता नहीं होना चाहिए। अब यह देखना भी दिलचस्प होगा कि केंद्रीय मंत्री की इस सार्वजनिक चेतावनी के बाद आरटीओ की गांधीगिरी चलती रहती है या बंद होती है।
सरकारी परिवहन की पुरानी व्यवस्था से एक सीख और मिलती है। आज तकनीक के कारण व्यवस्था को पहले से ज्यादा पारदर्शी बनाया जा सकता है। डिजिटल टिकटिंग से हर यात्रा का रिकॉर्ड, राजस्व और यात्रियों की संख्या का डेटा उपलब्ध रह सकता है। इसी डेटा से रूट की वास्तविक उपयोगिता भी समझी जा सकती है। वैसे सरकार सामाजिक जरूरत वाले रूट पर घाटे के बावजूद बस चला सकती है, लेकिन आधुनिक दौर में राजस्व की अनदेखी करना सरकारों के लिए मुश्किल ही होता जा रहा है लेकिन यह भी सरकार की ही जवाबदारी है कि वह देश या प्रदेश के हर क्षेत्र के नागरिकों को सुगम परिवहन उपलब्ध कराए।
वैसे आज जहां निजी ऑपरेटर अच्छी सेवा दे रहे हैं, जैसे इंदौर-भोपाल रुट पर हर पंद्रह मिनिट पर निजी बसें उपलब्ध हैं, ऐसे में वहां सरकारी बसें उसी बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के बजाय उन क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दे सकती हैं जहां परिवहन की कमी है। जहां मांग कम हो, वहां समय-सारणी की समीक्षा हो। जहां मांग बढ़े, वहां सेवा बढ़े।
किसी भी सरकारी योजना की सफलता का सबसे अच्छा पैमाना उसका आखिरी लाभार्थी होता है। मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के मामले में यह आखिरी लाभार्थी वह ग्रामीण यात्री होता है जिसके पास अपना वाहन नहीं है और जिसके गांव में नियमित बस का इंतजार लंबे समय से है। एक छात्र के लिए बस का मतलब कॉलेज या स्कूल तक पहुंचना है। एक बुजुर्ग के लिए अस्पताल तक। किसान के लिए मंडी तक। इसीलिए सरकारी बस सेवा में भरोसा तभी बनेगा, जब यात्री को पता हो कि वह जिस समय बस का इंतजार कर रहा है, उस समय बस मिलेगी और जिस रूट पर सेवा घोषित है, वहां नियमित रूप से चलेगी।
बस का रंग बाद में बदल सकता है,फ्लेक्स उतर सकता है लेकिन किसी गांव तक पहुंचने वाली नियमित बस वहां के लोगों की जिंदगी में उजाले के रंग भर सकती है,इसलिए सरकारी परिवहन की पहचान बस के रंग से नहीं, उसके रूट और उसकी उपयोगिता से होना चाहिए।
लेखक
पवन वर्मा -विनायक फीचर्स
