रानी ने जब अभिशप्त किया मंडी को

मंडी के इतिहास में राजा सुरजसेन (1637-

1664) का कार्यकाल एक विशेष महत्ता रखता है। उसे अपनी सीमाओं को बढ़ाने की अजीब चाह थी। उसने इसी इच्छा से कई युद्ध लड़े। सभी में जीता तो नहीं परंतु कुल्लू, सुकेत और गुलेर तक के राजाओं को ललकारा। कुछ समय नूरपुर के राजा का बंदी भी रहा फिर भी हौंसला न हारा।

उसने संघोल में कमलाह दुर्ग का निर्माण किया जो उस युग में अजेय माना जाता था। मंडी में दमदमा नामक राजप्रासाद भी उसी की देन है। वैष्णव धर्म का राज्य में प्रवेश सुरजसेन के काल की ही घटना है। अपने बुढ़ापे के दिनों में उसे दुखों का सामना करना पड़ा। राज्य, संपदा और समृद्धि की रक्षक संतान का सुख उसे न मिल पाया। अट्ठारह संतानों की अकाल मृत्यु ने उसे बुरी तरह से झकझोर रखा था। वह निराश भी था, हताश भी परंतु दमदमा भवन निराशा के क्षणों में भी उसके लिए बहुत कुछ था क्योंकि उसे गर्व था कि ऐसा भवन और ऐसी कारीगिरी कहीं भी पहाड़ी भवनों में देखने को नहीं मिलती। वह चाहता था कि कोई दूसरा राजा ऐसा भवन न खड़ा कर दे अतः उसने दगदमा के कारीगरों के हाथ तक कटवा दिए थे।

जब अंत तक वह संतान सुख से वंचित रहा तो उलने कृष्ण राधा की चांदी की प्रतिमाएं बनाने का आदेश दिया। उनके लिए चांदी का विशाल सिंहासन बनाया और उसे एक बड़े छत्र से सुशोभित किया। इसी मूर्ति को सिंहासन पर बिठा, अपना राज्य राधाकृष्ण की प्रतिमा को समर्पित किया और उनके अनुचर के नाते

राजकाज चलाने लगा। प्रतिमा को नाम दिया राजमाधव जो बाद में बिगड़े रूप में माधोराम विख्यात हुआ।

इसका निर्माण भीमा सुनार ने किया था जो मूर्ति के ऊपर खुदे अभिलेख पर अंकित है। दमदमा राजप्रासाद के घरातली मंजिल के एक विशिष्ट कक्ष में प्रतिमा को स्थापित किया जो आज भी विद्यमान है। राजाओं के राज गए फिर भी मंडी जनपद के आज भी राजमाधव ही देवाधिदेव हैं। राज्य भर के देवी देवता आज भी मंडी नगर में प्रवेश कर सर्वप्रथम राजमाधव के मंदिर में अपनी उपस्थिति अवश्य देते हैं। यह दृश्य शिवरात्रि के मेले में आज भी देखा जा सकता है। सूरजसेन की यह धरोहर आज भी मंडी जनमानस के आस्था और

विश्वास की केंद्र स्थली है और ऐसा प्रतीत होता है आने वाले काल में भी यह परंपरा बनी रहेगी।

सूरजसेन का जब देहांत हुआ तो उसके शव के साथ अट्ठारह रानियां और उपरानियां सति प्रथा की भेंट चढ़ी थीं। उनमें प्रधान थी प्रकाशदेई। अपने धार्मिक संस्का रों और जनोपयोगी कार्यों के कारण वह प्रजा में लोकप्रिय थी। प्रजा राजा से भी बढ़ कर उसे सम्मान देती थी।

मृत्युशैय्या पर लेटे राजा से वह तत्कालीन प्रथाओं के अनुसार बहुमूल्य वस्तुओं का दान राजा के हाथों 

करवाना चाहती थी परंतु विडंबना यह कि इस घड़ी कोई भी कर्मचारी उसके आदेश तो दूर अनुनय विनय पर भी गौर नहीं कर रहा था। राजकोष को इस भांति

छुपाया गया कि रानी की पहुंच से बाहर रहा। सनी यह अपमान न सह पाईं। राजपूतनी की कमर की कटार उसके स्वाभिमान की प्रतीक थी। उसका हाथ उस पर गया। अत्यंत बिशिप्त दशा और असह्य अपमान की पीड़ा से उसने कटार खींची और जोर से कई फीट चौड़ी दीवार पर दे मारी। जहां एक निशान बन गया। आज भी दमदमा प्रसाद की दीवार पर वह निशान देखा जा सकता है। साथ ही उसने वहाँ उपस्थित सभी कर्मचारियों को शाप से फटकारा, जिसे लोकभाषा में’ मंडी कोलसरा हरामखोरों की परोल ‘से याद किया जाता है।

मंडी राज्य के इतिहास का अध्ययन और विवेचन

मृत्युशैय्या पर लेटे राजा से वह तत्कालीन प्रथाओं के अनुसार बहुमूल्य वस्तुओं का दान राजा के हाथों करवाना चाहती थी परंतु विडं बना यह कि इस घड़ी कोई भी कर्म चारी उसके आदेश तो दूर अनुनय-विनय पर भी गौर नहीं कर रहा था। राजकोष को इस भांति छुपाया गया कि रानी की पहुंच से बाहर रहा। रानी यह अपमान न सह पाई। राजपूतनी की कमर की कटार उसके स्वाभिमान की प्रतीक थी। उसका हाथ उस पर गया।

इस तथ्य को उजागर करता है कि शक्ति, समृद्धि,

संपदा और संतान यहां केवल अविश्वसनीय, विश्वास घाती, निष्ठाहीन और धूर्तों के हाथों ही लगी। ईमानदार और समर्पित व्यक्ति यहां न पनप पाए। बुजुर्ग अपने और अपने से पहले की पीढ़ियों के अनुभव के आधार पर सदा कहे-सुने जाते थे कि रानी का अभिशाप आज भी इस जनपद को झेलना पड़ रहा है। वे रानी द्वारा अभिशापित वाक्यों का प्रमाणों द्वारा सिद्ध करने के कई प्रयल करते भी थे।

यहां दो शब्द ‘परोल’ और ‘कोलसरा’ जो

अभिशापित वाक्य के अंग हैं। विशेष अर्द्ध लिए हुए हैं। परोल का अर्द्ध प्रवेशद्वार या शरणस्थली होता है। कोल सरा उस जगह का नाम है जहां से सेन वंशीय राजाओं ने ब्यास को पार कर वर्तमान नगर की नींव रखी थी। कालांतर में केवल स्थान का नाम मंडी रह गया जो पूर्व वर्षों में मंडी- कोलसरा कहलाता था। आज भी व्यास के बायीं ओर एक विशाल चट्टान विद्यमान है जिसे कोलसरा चट्टान कहते हैं। इसी स्थान पर पुरानी मंडी से नई मंडी में राजधानी बनाने के लिए राजा अजबरसेन के दल ने 1527 में प्रवेश किया था, जो मंडी राज्य का सही शब्दों में पहला राजा पहचाना जाता है।

– डॉ बी एल कपूर –

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