तबाकू से सिंथेटिक का सफर जान लेवा

सुभाष ठाकुर*******

सिंथेटिक नशे में चूर आज का युवा इस पौधे की शायद ही कोई पहचान करे। 90 के दशकों में ग्रामीण क्षेत्रों में धूम्रपान हुक्का से किया जाता था। हुक्का पीने वालों द्वारा अपने घर के इर्द-गिर्द तबाकू की खेती कर उसे बरसात के बाद काट कर सुखाया जाता था और सर्दियों, गर्मियों में निरंतर घर में हुक्के की गुड़गुड़ से धूम्रपान किया जाता था।

हुक्का पीने वालों की संख्या अब न के बराबर हुई है। साधारण नशे हुक्का पीने वाले अब बहुत कम मिलेंगे, लेकिन अब जान लेवा सिंथेटिक नशे में चिट्ठा, हीरोइन जैसे मंहगे नशे पाने के लिए चोरी डकैती तक करने के लिए मंजूर होना पड़ता है। नशा नहीं मिलने पर उन्हें चोरी जैसी वारदात में शामिल होना पड़ता है। वहीं अपनी जान से भी युवा को इस जान लेवा सिंथेटिक नशे की बेड़ियों में संलिप्त होने पर अपनी जान तक गवानी पड़ती है।

हुक्का पीने वालों को कोई नुकसान नहीं होता था ऐसा भी नहीं, नाश कोई भी हो उसका दुष्प्रभाव एक नशे पीने वालों तक ही नहीं बल्कि पूरे परिवार पर इसका गलत प्रभाव पड़ता है। बच्चों को जानकारी मिलती है कि यह नशा कैसा होता है इसका कैसा टेस्ट होता है यानी जब घर में बड़ा कोई नशा जब करता है, बच्चे नशे करने वालों को जब देखते हैं तो बच्चा भी अकेलेपन में बड़ों को नशा करते हुए देखे हुए सीन को आजमाते आजमाते नशे की जकड़ में संलिप्त हो जाता है।

नशा करने वालों को ध्यान रखना चाहिए कि खास कर बच्चों के सामने नाश करने से बचना चाहिए। नशे की लत एक बार लग गई तो इससे छुटकारा पाना बहुत मुश्किल होता है। नशे के दुष्प्रभाव से न केवल व्यक्ति बल्कि पूरा परिवार प्रभावित होता है। इसलिए नशे से दूर रहना ही बेहतर है।

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