सुभाष ठाकुर*******
चौहार घाटी के आराध्य देवता एवं मंडी की अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि की शान देवता श्री हुरंग नारायण आज सायं 6 बजे अपने मूल मंदिर हुरंग गांव से प्रस्थान कर भट्ठेहड़ गांव पहुंचेंगे, जहां वे रात्रि ठहराव करेंगे।
देवता कमेटी के प्रधान राजू राम ने जानकारी देते हुए बताया कि देवता श्री हुरंग नारायण शाम 6 बजे के बाद मंदिर से रवाना होकर भट्ठेहड़ गांव में ब्राह्मण परिवार के घर रात्रि विश्राम करेंगे। इसके बाद 9 फरवरी को देवता का ठहराव सियूंन पंचायत में रहेगा, जबकि 10 फरवरी को देवता नारला में रुकेंगे। इसके उपरांत देवता मंडी की अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि में शामिल होंगे।
उन्होंने बताया कि जब भी देवता श्री हुरंग नारायण का रथ तैयार किया जाता है, तो सबसे पहले ब्राह्मण द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। वर्तमान में देवता के ब्राह्मण हंस राज शर्मा हैं। देवता समाज में इस ब्राह्मण पद को “भाटू” कहा जाता है, जिसका विशेष धार्मिक और परंपरागत महत्व है।
देवता श्री हुरंग नारायण के मुख्य गुर संजय ठाकुर हैं, जबकि पुजारी का दायित्व राजू राम निभा रहे हैं। माता जोगणी के गुर वीर सिंह हैं। देवता परंपरा से जुड़े अन्य प्रमुख पदाधिकारियों में भंडारी मान सिंह, गुर वीर सिंह, डुमच राम सिंह और संतराम शामिल हैं।
देवता श्री हुरंग नारायण मंडी महाशिवरात्रि में शामिल होने वाले देवताओं में सबसे प्राचीनतम माने जाते हैं। इनका उल्लेख मंडी रियासत के राजपत्रों में मिलता है। वर्ष 2019 में सुंदरनगर के डॉ. संजीव राघव द्वारा किए गए शोध के आधार पर अमेरिका में प्रकाशित शोध पत्र में देवता श्री हुरंग नारायण का ऐतिहासिक महत्व स्पष्ट रूप से सामने आया है।
शोध के अनुसार, वर्ष 1554 में मंडी रियासत के राजा साहिब सेन की पत्नी रानी प्रकाश देई ने देवता श्री हुरंग नारायण से पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगी थी। मन्नत पूर्ण होने पर रानी ने अपने गले का हीरा पिघलवाकर देवता का मोहरा बनवाया, जिसे वर्ष 1555 से आज तक देवता के रथ में धारण किया जाता है।
डॉ. संजीव राघव के शोध में यह भी प्रमाणित किया गया है कि चौहार घाटी के आराध्य देवता श्री हुरंग नारायण ही मंडी रियासत के राजाओं के मूल इष्ट देवता रहे हैं।
