सुभाष ठाकुर*******
हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थानों के चुनाव को लेकर स्थिति लगातार उलझती जा रही है। रोस्टर जारी होने और न्यायालय के आदेशों के बीच संभावित उम्मीदवारों की रणनीतियां प्रभावित हो रही हैं, जिससे चुनावी तैयारियों में अनिश्चितता बढ़ गई है।
पंचायती राज संस्थानों के चुनाव अब लुकाछिपी का खेल बनते नजर आ रहे हैं। पिछले कई महीनों से चुनावी रणनीति तैयार कर रहे संभावित उम्मीदवारों की योजनाओं पर उस समय पानी फिर जाता है, जब एक ओर सोशल मीडिया पर रोस्टर सामने आता है और दूसरी ओर न्यायालय के आदेश आते ही अलग परिस्थितियां पैदा कर देते हैं।
प्रदेश में 23 जनवरी 2026 को पंचायती राज संस्थानों के पदाधिकारियों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। इसके बाद राज्य सरकार ने चुनावों को कुछ समय के लिए स्थगित करने का निर्णय लिया था। सरकार का तर्क था कि चुनावी ड्यूटी में शिक्षकों की भागीदारी के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई और परीक्षाएं प्रभावित हो सकती हैं, इसलिए चुनावों को आगे बढ़ाया जाए।
सरकार जहां मई 2026 में चुनाव करवाने के पक्ष में थी, वहीं राज्य चुनाव आयोग समय पर चुनाव कराने पर जोर दे रहा था। दोनों के बीच बढ़ते मतभेद के चलते मामला न्यायालय तक पहुंच गया और अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने 31 मई 2026 तक प्रदेश में पंचायती राज संस्थानों के चुनाव संपन्न करवाने के आदेश जारी कर दिए।
अब 31 मई की समयसीमा नजदीक आने के बावजूद स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है। न तो रोस्टर पूरी तरह से जारी हुआ है और न ही मतदाता सूची अंतिम रूप ले पाई है। इससे चुनावी मैदान में उतरने वाले उम्मीदवारों के सामने अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रोस्टर जारी होने के बाद उम्मीदवारों और पंचायतों को कम से कम तीन माह का समय मिलना चाहिए, ताकि वे जनसंपर्क, प्रचार और रणनीति बनाने का कार्य सुचारू रूप से कर सकें। लेकिन मौजूदा हालात में यह समय सीमित होता जा रहा है, जिससे चुनाव प्रक्रिया में जल्दबाजी की आशंका बढ़ रही है।
ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि निर्धारित समयसीमा के भीतर चुनाव प्रक्रिया कितनी पारदर्शिता और तैयारी के साथ पूरी हो पाती है।
