अमर ज्वाला,बरोट//चौहार घाटी
एक दौर वह था जब पहाड़ों में सड़कों का अभाव था और गांवों तक जरूरी सामान पहुंचाने के लिए घोड़ों और खच्चरों पर ही निर्भर रहना पड़ता था। आज भले ही अधिकांश गांव सड़क सुविधा से जुड़ चुके हैं, लेकिन चौहार घाटी की लटराण पंचायत के ख्वाण गांव के मनोहर लाल ने इसी पारंपरिक व्यवस्था को अपने जीवन का आधार बनाकर एक सफल व्यवसाय खड़ा कर दिया है।
मात्र 13 वर्ष की आयु में एक घोड़ी के साथ अपने सफर की शुरुआत करने वाले मनोहर लाल आज हिमाचल प्रदेश के प्रमुख घोड़ा एवं खच्चर पालकों में गिने जाते हैं। उन्होंने गांव से थलटूखोड़ तक सामान ढुलाई के कार्य से शुरुआत की थी और धीरे-धीरे एक-एक पशु जोड़कर अपने कारोबार को विस्तार दिया। करीब 25 वर्षों की अथक मेहनत के बाद आज वह उच्च नस्ल के घोड़े, घोड़ियां और खच्चर तैयार कर प्रदेश सहित अन्य पहाड़ी राज्यों में बिक्री कर रहे हैं।
मनोहर लाल बताते हैं कि वर्तमान में उनके पास 25 खच्चर, 50 घोड़ियां, 16 घोड़े, एक गधा तथा 15 बच्चे (शावक) हैं। इन दिनों उनके सभी पशु मनाली के हामटा क्षेत्र में रखे गए हैं, जहां उन्हें बेहतर चारागाह और अनुकूल वातावरण मिलता है। पर्यटन सीजन के दौरान बड़ी संख्या में लोग ट्रैकिंग और पर्यटन गतिविधियों के लिए उनके घोड़े, घोड़ियां और खच्चर किराए पर लेकर जाते हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय भी प्राप्त होती है।
उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष वह उत्तर प्रदेश से करीब दो लाख रुपये की लागत से एक उच्च नस्ल का गधा खरीदकर लाए थे, जिससे बेहतर नस्ल की खच्चरें तैयार हो रही हैं। हाल ही में वह चार खच्चरों की बिक्री कर लगभग छह लाख रुपये की आय अर्जित कर चुके हैं। उनका कहना है कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे पर्वतीय राज्यों में ट्रैकिंग, तीर्थयात्राओं और सामान ढुलाई के लिए प्रशिक्षित घोड़ों एवं खच्चरों की मांग लगातार बनी रहती है।
300 पशुओं तक पहुंचाने का लक्ष्य

मनोहर लाल का सपना अपने पशुधन की संख्या को 300 से अधिक तक पहुंचाने का है। उनका कहना है कि यह कार्य बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण है, लेकिन मेहनत और अनुभव के दम पर इसमें अच्छी आमदनी भी संभव है।

वह बताते हैं कि पहले जब पशुओं की संख्या कम थी तो वह अपने गांव के आसपास ही उनका पालन-पोषण कर लेते थे, लेकिन संख्या बढ़ने के बाद अब उन्हें मौसम के अनुसार स्थान बदलना पड़ता है। गर्मियों में वह मनाली क्षेत्र और सर्दियों में जाहू व ऊना की ओर अपने पशुओं के साथ चले जाते हैं।
चारागाह के लिए लाइसेंस की मांग

मनोहर लाल ने पशुपालन विभाग और वन विभाग से मांग की है कि उन्हें बरोट क्षेत्र के वन क्षेत्रों में चारागाह उपयोग के लिए लाइसेंस प्रदान किया जाए, ताकि बरसात और सर्दियों के दौरान वह अपने क्षेत्र में ही अपने पशुओं को रख सकें। उनका मानना है कि इससे न केवल उनके व्यवसाय को बढ़ावा मिलेगा बल्कि क्षेत्र में पशुपालन को भी नई दिशा मिलेगी।
चौहार घाटी मेहनतकश लोगों की धरती
मनोहर लाल का कहना है कि चौहार घाटी हमेशा से मेहनतकश लोगों की धरती रही है। यहां के लोगों ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद मेहनत, संघर्ष और आत्मविश्वास के बल पर अपनी अलग पहचान बनाई है। घाटी में मेहनतकश लोगों की कोई कमी नहीं है, जरूरत केवल सही मार्गदर्शन और अवसर की है। यदि युवाओं को उचित सहयोग और संसाधन मिलें तो वे स्वरोजगार के क्षेत्र में नई मिसाल कायम कर सकते हैं।
युवाओं के लिए प्रेरणा
चौहार घाटी के दुर्गम गांव से निकलकर एक घोड़ी से शुरू हुआ मनोहर लाल का सफर आज सफलता की मिसाल बन चुका है। उनकी कहानी यह साबित करती है कि यदि व्यक्ति में मेहनत, धैर्य और लगन हो तो पारंपरिक व्यवसाय भी आधुनिक दौर में रोजगार और आत्मनिर्भरता का मजबूत माध्यम बन सकता है। आज मनोहर लाल न केवल अपने सपनों को साकार कर रहे हैं, बल्कि पहाड़ के युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।
