रूप उपाध्याय की अध्यक्षता में सांस्कृतिक संगोष्ठी: नई पीढ़ी को लोक-संस्कृति और रंगमंच से जोड़ने का लिया संकल्प

मंडी की 11 सांस्कृतिक संस्थाएं एक मंच पर आईं, कलाकारों के हितों की रक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों को नई ऊर्जा देने पर हुआ मंथन

अमर ज्वाला//मंडी, 
लोक-संस्कृति, रंगमंच और सिनेमा के बदलते दौर में युवाओं का घटता रुझान तथा नई संभावनाओं पर गंभीर चिंतन के उद्देश्य से शनिवार को तपस अकैडमी, मंडी में वरिष्ठ रंगकर्मी एवं प्रदेश के सबसे अनुभवी रंगमंच कलाकारों में शुमार रूप उपाध्याय की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी आयोजित की गई। इस संगोष्ठी में मंडी जनपद की 11 प्रमुख सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर प्रदेश की लोक-संस्कृति के संरक्षण और नई पीढ़ी को सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ने के लिए साझा रणनीति तैयार करने का संकल्प लिया।

संगोष्ठी का उद्देश्य जिले की विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं को एक मंच पर लाना, आपसी समन्वय बढ़ाना तथा कलाकारों की मूलभूत समस्याओं पर गंभीर चर्चा करना रहा। इस दौरान माण्डव्य कला मंच के संस्थापक अध्यक्ष एवं संगोष्ठी संयोजक कुलदीप गुलेरिया, नवज्योति खेलकूद एवं सांस्कृतिक कला मंच के प्रधान इंद्रपाल इन्दू, सचिव जय कुमार जैक, साख सोसायटी के संस्थापक अध्यक्ष रामपाल मलिक, हिमाचल प्रदेश सांस्कृतिक शोध संस्थान की सचिव सीमा शर्मा, उत्सव की अध्यक्षा दक्षा शर्मा, आकर थिएटर सोसायटी के प्रतिनिधि अनिल मेहता, तपस अकैडमी के संचालक लतेश शर्मा, उपाध्यक्ष मीना ठाकुर, शिव गौरी कला मंच के संस्थापक बीरी सिंह, सबरंग कला मंच के उपप्रधान हरदेव सिंह चौहान तथा प्रयास कला परिषद के प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ रंगकर्मी रूप उपाध्याय ने कहा कि लोक-संस्कृति और रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की पहचान और सांस्कृतिक विरासत के संवाहक हैं। उन्होंने कहा कि यदि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना है तो युवाओं को रंगमंच, संगीत, लोकनृत्य और अन्य कला विधाओं से जोड़ने के लिए सामूहिक प्रयास करने होंगे। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे मोबाइल और सोशल मीडिया की सीमाओं से बाहर निकलकर अपनी संस्कृति को जानें और उसे आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाएं।

विचार-विमर्श के दौरान कलाकारों ने चिंता व्यक्त की कि मंडी शहर के मध्य में आज भी ऐसा कोई स्थायी स्थान उपलब्ध नहीं है, जहां कलाकार नियमित अभ्यास कर सकें या सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दे सकें। इसे सांस्कृतिक गतिविधियों में आई कमी का एक प्रमुख कारण बताया गया। इस समस्या के समाधान के लिए निकट भविष्य में सभी संस्थाओं का एक साझा मंच गठित करने का निर्णय लिया गया, जो कलाकारों की आवाज को शासन और प्रशासन तक प्रभावी ढंग से पहुंचाएगा।

संगोष्ठी में कलाकारों के सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक सुरक्षा के मुद्दे पर भी गंभीर चर्चा हुई। सभी संस्थाओं ने मिलकर समय-समय पर संयुक्त नाट्य एवं सांस्कृतिक समारोह आयोजित करने का निर्णय लिया ताकि स्थानीय कलाकारों को बेहतर अवसर और मंच उपलब्ध हो सके।

बैठक में यह मुद्दा भी प्रमुखता से उठा कि बाहरी प्रदेशों से आने वाली कुछ संस्थाएं हिमाचल की लोक-संस्कृति के नाम पर बड़े आयोजन करती हैं, लेकिन स्थानीय कलाकारों और संस्थाओं को उचित सम्मान और पारिश्रमिक नहीं देतीं। इस प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए सभी संस्थाओं ने ऐसे मामलों का सामूहिक रूप से विरोध करने और स्थानीय कलाकारों के हितों की रक्षा के लिए एकजुट होकर कार्य करने का संकल्प लिया।

संगोष्ठी का समापन इस विश्वास के साथ हुआ कि वरिष्ठ कलाकार रूप उपाध्याय के मार्गदर्शन और सभी सांस्कृतिक संस्थाओं के सामूहिक प्रयास से मंडी की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊर्जा मिलेगी तथा नई पीढ़ी में लोक-संस्कृति और रंगमंच के प्रति फिर से रुचि विकसित होगी।

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