अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि मेले में शामिल हुए चौहार घाटी के देवता,
देव सदन की व्यवस्थाओं पर देवलुओं ने उठाए सवाल
सुभाष ठाकुर*******
दुर्गम चौहार घाटी की बरोट वैली से देवता पशाकोट, जिन्हें देवताओं के ‘पहाड़ी वजीर’ के नाम से जाना जाता है, इस वर्ष भी मंडी की अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि मेले में शामिल होने के लिए लगभग 80 किलोमीटर का एकतरफा पैदल सफर तय कर पड्डल मैदान पहुंचे।
देवता पशाकोट ने 31 जनवरी को अपने मंदिर थलटूखोड़ नालदेहरा भंडार से दर्जनों देवलुओं के साथ पैदल यात्रा आरंभ की। कठिन पहाड़ी रास्तों से होते हुए देवता मंडी पहुंचे और पड्डल मैदान की सीढ़ियों पर प्रशासन द्वारा लगाए गए पकौड़ा शैली के टेंट के नीचे विराजमान अन्य देवी-देवताओं के साथ आसीन हुए।
यह ऐतिहासिक मेला हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि मेला मंडी के रूप में देश-विदेश में प्रसिद्ध है, जिसमें 216 सैकड़ों देवी-देवता भाग लेते हैं।
देवता के साथ आए माता नौणी के युवा गुरु संजय ठाकुर ने बताया कि उन्हें देव श्री पशाकोट और माता रानी की कृपा से इतनी कम उम्र में यह सेवा करने का अवसर मिला है, जिसे वह अपना सौभाग्य मानते हैं।
आराध्य देव पशाकोट के गुर भाटकु राम जी भगवती नौणी माता के गुरु संजय कुमार, पुजारी हरि सिंह, भंडारी , श्याम ठाकुर , कारदार , प्रकाश ठाकुर, सुरेश कुमार, शेर सिंह द्वारा यह संयुक्त जानकारी देते हुए कहा कि लंबा सफ़र पैदल करते हुए विभिन्न मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
देव सदन की व्यवस्थाओं पर सवाल
प्रशासन द्वारा पंजीकृत देवी-देवताओं के रात्रि ठहराव की व्यवस्था कांगनी धार स्थित देव सदन में की गई है। हालांकि कुछ देवलुओं ने सुविधाओं को लेकर असंतोष जताया। उनका कहना है कि मोबाइल चार्जिंग के लिए पर्याप्त विद्युत प्वाइंट नहीं हैं। यदि चार से छह चार्जिंग प्वाइंट लगाए जाते तो बेहतर सुविधा मिलती।
इसके अतिरिक्त कुछ देवलुओं ने कहा कि सोने के लिए तलाई या गद्दों की व्यवस्था होनी चाहिए थी। देवताओं के गुर, पुजारी और कारदार परंपरा अनुसार दूसरे के बिस्तर पर नहीं सोते, इसलिए उन्हें अपना सामान साथ रखना पड़ता है, जिस पर वे विश्राम करते हैं।
बाथरूम की साफ-सफाई को लेकर भी शुरुआती दो दिनों में परेशानी की बात सामने आई है। देवलुओं का कहना है कि उम्मीद है प्रशासन शीघ्र उचित व्यवस्था करेगा।
चौहार घाटी के देवगढ़ क्षेत्र से देवता पशाकोट के अलावा हस्तपुर क्षेत्र से घाटी के आराध्य देवता श्री हुरंग नारायण, देवता श्री पेखरा गहरी, अमरगढ़ क्षेत्र से श्री घड़ौनी नारायण, श्री त्रैलू महादेव, बथेर गहरी , माता भराड़ी तथा देवता द्रुण गहरी (जिन्हें द्रोणाचार्य का स्वरूप माना जाता है) भी मेले में शामिल हुए हैं।
देव संस्कृति में देवी-देवताओं को दया, करुणा और न्यायप्रियता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। अग्नि, वायु और सूर्य जैसे तत्वों से जुड़ी उनकी मान्यताएं लोकआस्था का आधार हैं।
हाल के समय में देवताओं को बड़ा-छोटा बताने की होड़ पर भी देवलुओं ने चिंता जताई। उनका कहना है कि आस्था भले अलग-अलग हो, लेकिन कोई भी देवता छोटा नहीं होता। सभी देवी-देवता महान हैं और सदैव रहेंगे।
