देव समाज का दिव्य न्याय मंचः त्रिलोकीनाथ मंदिर में सजा चौहार घाटी का ऐतिहासिक हारका

सुभाष ठाकुर*******

अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि मेले के बीच शनिवार को चौहार घाटी के देवताओं का ‘हारका’, देव परम्पराओं अनुसार  देवताओं के विवादित कई मामलों को लेकर पहले आपसी चर्चा उसके बाद हारका का विशेष कार्यक्रम हुआ ।

अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि मेले के दौरान शनिवार को चौहार घाटी के सभी देवी-देवताओं के गुर, पुजारी, देवता कमेटियों के प्रधान, करदार, डुमच तथा देव समाज से जुड़े लोगों ने पुरानी मंडी स्थित त्रिलोकीनाथ मंदिर में पारंपरिक ‘हारका’ में भाग लिया। यह आयोजन हर वर्ष मेले के बीच आयोजित किया जाता है, जिसमें घाटी के आराध्य देवता श्री हुरंग नारायण की उपस्थिति में समस्त देव समाज एकत्रित होता है।
हारके में देवी – देवताओं के मुझे सेवकों में से हुरंग नारायण के गुर संजय ठाकुर, माता जोगनी के गुर बीरी सिंह ठाकुर , पुजारी राजू राम, करदार राजू राम दुमच संत राम,मान सिंह, पंडित हँस राज ,
घड़ौनी नारायण के गुर रोशन लाल, परमा नद पुजारी रामलाल , प्रधान तोलू, सफ़र कारदार , नरेंद्र कुमार , दिनेश कुमार,

पशाकोट देवता के गुर भाटकू राम , माता नौणी के गुर संजय कुमार ,पुजारी हरि सिंह , सुरेश ,शेर सिंह ,प्रकाश

पेखरू देवता के गुर
राजू राम , पुजारी बॉबी, भंडारी प्रेम सिंह ,
द्रुण देवता पुजारी शिव कुमार इत्यादि इन्हें शामिल इनका रहना जरूरी रहता है। इसके इलावा बहुत से लोग अपनी अपनी समस्याओं की जानकारियां देवता के समक्ष पहुंचते हैं।

द्रुण देवता गुर के हुक्कू चंद, पुजारी शिव सिंह , भंडारी टेक सिंह, डुमच जय सिंह भट्टू चेतराम

त्रैलू महादेवता गुर पंडित हरि सिंह  माता का गुर अमृत लाल ,पुजारी अरुण कुमार, भंडारी इन्द्रदेव डुमच लेखराज , व हिरा लाल, भाटू महेंद्र सिंह ,

क्या है ‘हारका’ की परम्परा

देव समाज में ‘हारका’ का अर्थ है

हर कार्यों की जानकारियां से संबंधित देव संस्कृति के अनुसार विवादित, रोगदोष,  बारिश ,धूप पानी बीमारियों के निवारण को लेकर  हारका कहते हैं।
देव नीतियों और प्राचीन परम्पराओं के अनुसार देवी-देवताओं से जनमानस की खुशहाली, वर्षा, धूप, जल-जंगल की समृद्धि, आपसी लड़ाई-झगड़ों से मुक्ति, बीमारियों से रक्षा तथा पशुधन व मानव जीवन की सुरक्षा के लिए देववाणी लेना।

इस प्रक्रिया में चावल के दाने (छोदा) और जंगली धूप के सूखे फूल, जिन्हें  ‘भंवरू’ कहा जाता है, देवता की विशेष धातु की थाली में अर्पित किए जाते हैं। धूप जलाकर ‘धनग्यारा’ और घंटी के साथ मंत्रोच्चारण किया जाता है। सबसे पहले देवताओं के गुर पूजा करते हैं, तत्पश्चात देवी माताओं के गुर उसी विधि को दोहराते हैं। इसके बाद देव समाज में घटित घटनाओं और विवादों पर देव नीति के अनुसार निर्णय लिया जाता है, जिसे वहीं सार्वजनिक रूप से सुनाया जाता है।

सभी देवताओं की उपस्थिति में हुआ आयोजन
शनिवार को हारका में घाटी के प्रमुख देवता—श्री घड़ौनी नारायण, देव श्री पशाकोट (जिन्हें पहाड़ी वजीर के नाम से जाना जाता है), देवता श्री पेखरु, देवता श्री द्रुण गहरी तथा देवता श्री त्रैलू महादेव के गुर-पुजारी अपनी-अपनी करंडियां, धूप का धनग्यारा और घंटियां लेकर पहुंचे। सभी ने बड़े देवता श्री हुरंग नारायण के समक्ष बैठकर परम्परानुसार विधि सम्पन्न की।

देव समाज का पारंपरिक न्याय मंच
देव समाज में हारका को एक प्रकार का पारंपरिक न्याय मंच भी माना जाता है। जिस प्रकार समाज के अन्य वर्गों में विवादों का निपटारा पुलिस थाने और न्यायालय में होता है, उसी प्रकार देव समाज में देवी-देवताओं के समक्ष रखे गए मामलों का निर्णय सर्वमान्य माना जाता है। देवता द्वारा दिया गया फैसला अंतिम और सभी के लिए स्वीकार्य होता है।

रियासत काल से जुड़ी परम्परा
मान्यता है कि श्री हुरंग नारायण को मंडी रियासत काल से देवताओं का राजा माना जाता रहा है। झटिंगरी राजमहल में रियासत काल के दौरान राजदरबार के महत्वपूर्ण निर्णयों में भी देवता की विशेष भूमिका रही। उसी परम्परा का निर्वहन आज भी किया जा रहा है।

चौहार घाटी के मंदिर हुरंग में भी समय-समय पर हारका आयोजित कर देवी-देवताओं से जुड़े आपसी विवादों और सामाजिक विषयों पर निर्णय लिए जाते हैं। यह परम्परा न केवल देव संस्कृति के संरक्षण में अहम भूमिका निभा रही है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता को भी सुदृढ़ कर रही है।

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