सियासत की मैली चादर और विकास से वंचित चौहार घाटी: आखिर कब बदलेगी तस्वीर?

कुर्सियों तक सीमित राजनीति, विकास से दूर चौहार घाटीः जनता ने खोला वर्षों की उपेक्षा का राज”

सुभाष ठाकुर********

चौहार घाटी के दुर्गम क्षेत्रों की जनता आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है, जबकि वर्षों से राजनीति करने वाले चौहार घाटी के कुछ नेताओं ने अपनी घाटी के लोगों का दर्द ही नहीं जाना बल्कि सियासत की रोटियां अपनी ही घाटी की जनता के नाम सेंकते रहे हैं।
नेताओं ने विकास के बड़े-बड़े दावे किए हैं। क्षेत्र के लोगों का मानना है कि सियासत की चादर इतनी मैली हो चुकी है कि अब उसकी सफाई केवल वादों और भाषणों से नहीं, बल्कि जवाबदेही, दूरदृष्टि और जनहित की राजनीति से ही संभव है। जिसके लिए चौहार घाटी के युवाओं और बुद्धिजीवियों ने अपने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। घाटी के विकास के लिए सियासत की राजनीति से ऊपर उठकर भाजपा व कांग्रेस के नाम की राजनीति को पीछे छोड़कर घाटी के विकास के लिए कार्य करना होगा तभी क्षेत्र में कृषि,बागवानी तथा पर्यटन क्षेत्र में विकसित कर क्षेत्र की आर्थिकी मजबूत हो पाएगी।

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ग्रामीणों का आरोप है कि चुनावी मौसम में विकास, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, बागवानी और पर्यटन जैसे मूल मुद्दों को पीछे छोड़कर मतदाताओं को विभिन्न प्रलोभनों के माध्यम से प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। परिणामस्वरूप क्षेत्र की वास्तविक समस्याएं हर चुनाव के बाद फिर उपेक्षा का शिकार हो जाती हैं और विकास की गति वहीं की वहीं रह जाती है।

चौहार घाटी के कई गांव आज भी सड़क सुविधा से वंचित हैं। लटराण पंचायत का ख्वांण गांव, बरोट पंचायत के कलहोग, काउ और नमाण गांव तथा बर्धान पंचायत का लछियांन गांव ऐसे उदाहरण हैं, जहां ग्रामीणों को आज भी कई किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर पहुंचना पड़ता है। कई स्थानों पर सड़कें गांवों से काफी दूर समाप्त हो जाती हैं, जिससे लोगों को खड़ी चढ़ाई पार करनी पड़ती है।

स्थिति इतनी गंभीर है कि बीमार मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए आज भी कुर्सी पर बैठाकर डंडों के सहारे कंधों पर उठाकर सड़क तक लाना पड़ता है। वहीं रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुएं ग्रामीणों को अपनी पीठ पर या घोड़ों के माध्यम से गांव तक पहुंचानी पड़ती हैं। यह तस्वीर उस दौर में सामने आ रही है जब देश डिजिटल और आधुनिक विकास की ओर तेजी से बढ़ रहा है।

क्षेत्र के जागरूक लोगों का कहना है कि चौहार घाटी की वास्तविक ताकत कृषि, बागवानी और पर्यटन क्षेत्र में छिपी हुई है। यदि इन क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया जाए तो हजारों युवाओं और किसानों के लिए स्वरोजगार एवं आय के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों को वह प्राथमिकता नहीं मिल पाई जिसकी आवश्यकता है।

ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र के किसानों और बागवानों को आर्थिक रूप से मजबूत करने, आधुनिक तकनीकों से जोड़ने तथा उनके उत्पादों के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध करवाने की दिशा में ठोस प्रयास नहीं किए गए। वहीं प्राकृतिक सौंदर्य, ट्रैकिंग मार्गों, सांस्कृतिक विरासत और साहसिक पर्यटन की अपार संभावनाओं के बावजूद पर्यटन क्षेत्र को भी अपेक्षित बढ़ावा नहीं मिल पाया।

स्थानीय लोगों का मानना है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं बल्कि दूरदर्शी सोच और विकास के स्पष्ट विजन की भी है। उनका कहना है कि क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कृषि, बागवानी और पर्यटन को विकास का आधार बनाया जाना चाहिए, लेकिन वर्तमान राजनीतिक सोच में ऐसे दीर्घकालिक विकास मॉडल की कमी दिखाई देती है। परिणामस्वरूप क्षेत्र के युवा रोजगार के लिए पलायन करने को मजबूर हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रही है।

ग्रामीणों ने मांग की है कि राजनीतिक दल और जनप्रतिनिधि केवल चुनावी नारों तक सीमित न रहें, बल्कि चौहार घाटी के किसानों, बागवानों, युवाओं और पर्यटन क्षेत्र के लिए ठोस कार्ययोजना बनाकर उसे धरातल पर लागू करें। तभी क्षेत्र के दूरदराज गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़कर आत्मनिर्भर और समृद्ध बनाया जा सकेगा।

चौहार घाटी की जनता अब केवल वादे नहीं, बल्कि सड़क, स्वास्थ्य, कृषि, बागवानी, पर्यटन और रोजगार के क्षेत्र में दिखाई देने वाला वास्तविक विकास चाहती है।

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