हिमाचल कांग्रेस का जमीनी ढांचा अधूरा, कार्यकर्ताओं में मायूसी—पंचायती चुनाव से पहले बढ़ी चिंता

सुभाष ठाकुर*******

हिमाचल प्रदेश में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार की कमजोर आर्थिक छवि के साथ-साथ अब संगठनात्मक स्थिति भी सवालों के घेरे में नजर आ रही है। प्रदेश कांग्रेस संगठन की मौजूदा स्थिति को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। माना जा रहा है कि संगठनात्मक ढांचे में देरी, गुटबाजी और विवादित पुनर्नियुक्तियों के कारण पार्टी को आगामी पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

प्रदेश कांग्रेस में संगठनात्मक नियुक्तियों की प्रक्रिया काफी धीमी रही। लंबे समय तक प्रदेशाध्यक्ष का पद पूर्व सांसद रानी प्रतिभा सिंह के पास ही रहा। इसके बाद विनय कुमार को प्रदेशाध्यक्ष नियुक्त किया गया, लेकिन उसके बाद भी संगठन को पूरी तरह सक्रिय नहीं किया जा सका। जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में महीनों का समय लगा, जबकि राज्य कार्यकारिणी के उपाध्यक्षों और सचिवों की नियुक्ति भी काफी देर से की गई।

सबसे अहम बात यह है कि ब्लॉक और पंचायत स्तर पर अब तक संगठनात्मक ढांचा खड़ा ही नहीं हो पाया है, जबकि यही स्तर पार्टी की असली ताकत माने जाते हैं। ऐसे में जब पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव नजदीक हैं और आचार संहिता की घोषणा कभी भी हो सकती है, तब तक उम्मीदवारों और दावेदारों में भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

इसी बीच संगठन में कुछ ऐसे फैसले भी चर्चा का विषय बने हुए हैं, जिनसे कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा है। आरोप हैं कि संगठन में उन लोगों को भी दोबारा जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं, जिन्होंने वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों में पार्टी उम्मीदवारों के खिलाफ काम किया था। इतना ही नहीं, कुछ ऐसे नेताओं को भी पद दिए गए हैं, जो पहले पार्टी छोड़कर अन्य दलों में शामिल हो गए थे और वहां भी टिक नहीं पाए।

बताया जा रहा है कि ऐसे कुछ नेताओं को सरकार की ओर से ऑउट सोर्स कम्पनियों को बड़े-बड़े टेंडर आवंटित किए जा रहे हैं । जहां सिर्फ पैसों के लेनदेन के सिवाय किसी से चर्चा तक नहीं करते । जबकि वे अपने ही पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से दूरी बनाए रखते हैं और फोन तक नहीं उठाते। इसके बावजूद उन्हें संगठन में पुनः जिम्मेदारियां दिए जाने से जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिन कार्यकर्ताओं ने पूर्व भाजपा सरकार के खिलाफ विभिन्न मुद्दों—जैसे पेपर लीक, कोविड काल में कथित अनियमितताएं, वेंटिलेटर और भर्तियों में गड़बड़ियों, खनन और वन कटान जैसे मामलों को लेकर आवाज उठाई थी, वे अब खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। इसका असर यह देखने को मिल रहा है कि पार्टी के कार्यक्रमों से कार्यकर्ताओं की दूरी बढ़ रही है और सोशल मीडिया पर भी संगठनात्मक गतिविधियों को लेकर उत्साह कम हुआ है।

दूसरी ओर, विपक्षी दल शुरुआत से ही जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने में जुटे हुए हैं, जिससे कांग्रेस के लिए चुनावी राह और भी मुश्किल नजर आ रही है।

हालांकि पंचायती राज चुनाव पार्टी के चुनाव चिन्ह पर नहीं लड़े जाते, लेकिन इन चुनावों का असर नेताओं की व्यक्तिगत छवि और जनाधार पर सीधा पड़ता है। आज के दौर में केवल पहुंच नहीं, बल्कि जनता के मुद्दों को उठाने और उनका समाधान करवाने की क्षमता ही उम्मीदवार की असली पहचान बन गई है।

ऐसे में साफ है कि अगर कांग्रेस संगठन ने समय रहते जमीनी स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत नहीं की और कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर नहीं की, तो पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में उसे कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *